Archive | विशेष

जगन पर तनी गन

Posted on 01 August 2010 by admin

जगन रेड्डी के राग-रवैए से कांग्रेस आलाकमान आक्रांत है, मना करने के बावजूद जगन न तो अपनी यात्राएं रोक रहे हैं और न ही अपनी उद्दात सियासी महत्वाकांक्षाओं पर ही कोई ब्रेक लगा पा रहे हैं। कांग्रेस को मालूम है कि अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाकर जगन भले ही आंध्र का चुनाव न जीत पाएं, पर राज्य में कांग्रेस की जड़ों में जरूर ही मट्ठा डाल सकते हैं, यकीनन इसका फायदा चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा को मिल सकता है। सो, कांग्रेस ने जगन पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जगन के साक्षी चैनल में किसका पैसा लगा है इसको लेकर प्रवर्तन निदेशालय खासा सक्रिय हो गया है, ‘इडी’ की अलग-अलग टीमें स्विजरलैंड, मॉरीशस व लंदन गई और उन्होंने पाया कि साक्षी चैनल को मिले धन में कथित रूप से फेरा नियमों का उल्लंघन हुआ है, सो जगन पर मुकदमा दायर करने की तैयारियां हो रही है, राजमाता से पंगा लेना इतना आसान नहीं, जगन को अब यह बात समझ लेनी चाहिए।

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बम-बम हैं वरुण

Posted on 24 July 2010 by admin

न्यूयॉर्क, विएना व दक्षिण फ्रांस से छुट्टियां मना ताजा-ताजा स्वदेश लौटे वरुण गांधी के पास जब देर रात गए पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी का फोन पहुंचा तब वे किंचित जेट-लैग में ही थे, क्योंकि उसी रात वे स्वदेश लौटे थे। जब अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने वरुण पहुंचे तो भगवा गांधी ने पाया कि अध्यक्ष जी की भाव-भंगिमाएं किंचित बदली-बदली सी हैं और अध्यक्ष जी ने खुले आम स्वीकार भी किया कि वरुण ही यूपी में पार्टी के भविष्य हैं, पर इससे पहले कि भाजपा वरुण को अपने चचेरे भाई राहुल गांधी के ‘यूपी मिशन 2012’ से मोर्चा लेने के लिए मैदान में उतारे, यह युवा गांधी अभी थोड़ा इंतजार करना चाहते हैं, और प्रदेश में पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए अपना सारा जोर लगाना चाहते हैं। सो, अध्यक्ष जी ने वरुण के समक्ष विकल्प पेश किया कि वे चाहे तो बंगाल, ओड़ीसा या असम के चुनाव प्रभारी हो सकते हैं तो वरुण ने मौके की नजाकत को भांपते हुए असम का चुनाव किया, ऐसे समय में जबकि पार्टी के अन्य राष्ट्रीय सचिवों को मात्र सहप्रभार से संतोष करना पड़ रहा है (यथा सिध्दू, वाणी त्रिपाठी आदि) वहीं वरुण को राम प्रकाश त्रिपाठी, बंगारू लक्ष्मण जैसे पार्टी के सीनियर नेताओं के समकक्ष बतौर चुनाव प्रभारी चुना जाना पार्टी में उनके बढ़ते कद का परिचायक है।

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सुशील पर भी ठुकेगी कील

Posted on 24 July 2010 by admin

बिहार के अति महत्वाकांक्षी उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी का सियासी भविष्य एक बड़े एनजीओ स्कैम के बाद गड्डमगड लग रहा है, और इस मसले पर पटना हाईकोर्ट के आक्रामक रुख को देखते हुए भाजपा व संघ भी एकबारगी सकते में है। सुशील मोदी पर अपनी एक चहेती स्वयंसेवी संस्था ‘समाधान सेवा समिति’ को गैर वाजिब तरीके से करोड़ों का फायदा पहुंचाने का आरोप है। सरकार की समेकित अल्प लागत स्वच्छता योजना के अंतर्गत शुष्क शौचालयों को जल प्रवाही शौचालय में परिवर्तित करने के लिए मोदी ने अपनी एक चहेती संस्था को राज्य के 4 जिलों के स्थानीय निकायों से बतौर पेशगी तकरीबन 5 करोड़ रुपए दिलवा दिए, जबकि वर्ष 2007 में इस संस्था की बैलेंसशीट मात्र 1 लाख 5 हजार रुपए की था, और वर्ष 2007-08 में संस्था ने अपनी बैलेंस शीट को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के चक्कर में 8 लाख 11 हजार रुपए का फर्जीवाड़ा लोन के नाम पर कर दिया। इस मामले में इंटरनेशनल ह्युमन राइट्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर संज्ञान लेते हुए पटना हाईकोर्ट ने न केवल जांच के लिए कमेटी बना दी है अपितु इस पूरे मामले को विजिलेंस जांच के लिए भी सौंप दिया है, बिहार में सिर पर विधानसभा चुनाव है, चुनांचे ऐसी बातें अपना चाल, चरित्र व चेहरा बदलने की आपाधापी में जुटी भाजपा के लिए एक खतरे की घंटी साबित हो सकती है।

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चावला हुए बावला

Posted on 21 July 2010 by admin

चुनाव आयुक्त के पद से हटने के बाद नवीन चावला क्या करेंगे? चावला साहब की बस तीन ही चाहत है या तो उन्हें अमरीका में भारत का राजदूत बना दिया जाए, नहीं तो फिर किसी प्रदेश का गवर्नर और अगर वह भी नहीं तो फिर राज्यसभा देकर ही उपकृत कर दिया जाए। कुछ कांग्रेसी इस बात की मुखालफत कर रहे हैं कि हमारे यहां ऐसी कोई परंपरा नहीं कि चुनाव आयुक्त को गवर्नर बनाया जाए, इसको लेकर देश में पहले ही काफी विवाद हो चुका है, ऐसे में चावला करीबी आर.के.त्रिवेदी की मिसाल देते हैं जो चुनाव आयुक्त के पद से हटने के बाद एक प्रदेश में राज्यपाल बन गए थे।

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अफजल पर असमंजस

Posted on 21 July 2010 by admin

क्या अफजल गुरु की फांसी में अभी और देर लग सकती है? महामहिम राष्ट्रपति के पास गुरु से पहले कोई 27 क्षमायाचिका विचाराधीन पड़ी हैं, गुरु का नंबर 28वां है और कायदे से उसका नंबर अभी आया भी नहीं है। राष्ट्रपति भवन से जुड़े सूत्र इस बात से इंकार करते हैं कि अभी उनके पास गुरु की क्षमायाचिका आई भी है, वहीं गृह मंत्रालय तनिक जल्दी में दिखता है और वह चाहता है कि अगर माननीय राष्ट्रपति इस फाइल पर कोई निर्णय नहीं ले पा रही हों तो वह यह फाइल वापिस मंत्रालय में भिजवा दें ताकि गुरु पर आगे की कार्यवाही की हरी झंडी दिखाई जा सके।

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मनमोहन को नोबल?

Posted on 11 July 2010 by admin

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बाद नोबल शांति पुरस्कार पाने की चाह में हमारे चुपचाप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हो गए हैं, सबसे हैरत की बात तो यह कि नोबल पुरस्कार के लिए उनके नाम का प्रस्ताव स्वयं ओबामा कर रहे हैं, विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि यह पुरस्कार डा. मनमोहन सिंह को अपने शासनकाल के चौथे वर्ष में मिल सकता है यानी आज से कोई दो वर्ष बाद। अब पूछने वाले फिजूल में पूछ रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री ने विश्व शांति के लिए क्या किया है? जवाब उतना ही आसान है जो ओबामा ने किया है कि जिनके लिए उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया,यानी जो चाहे अमरीका उसके आगे सब फीका।

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बम-बम है मोदी विरोधी

Posted on 05 July 2010 by admin

गुजरात में एसआइटी प्रमुख राघवन के नए दांव से मोदी सरकार हैरान-परेशान है, एसआइटी की पूरी कोशिश गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर शिकंजा कसने की है और इसके लिए बकायदा पूरी रणनीति का ताना-बाना तैयार हो चुका है, इस केस में राघवन ने मुंबई के एक मशहूर वकील के.जी.मेनन को रख लिया है जिनकी अकेले की फीस ही तकरीबन दो करोड़ रुपए सालाना है और इन वकील महाशय की फीस का भुगतान भी गुजरात सरकार को ही करना है, अब गुजरात सरकार भी बड़ी असमंजस में है कि जो शख्स उनकी सरकार के मुखिया को ठिकाने लगाने आया हो वो उसके गले में यूं नोटों का हार कैसे पहनाए, पर क्या करें बड़ी मजबूरी है…सिर पर केंद्र का डंडा है और खासकर ऐसे हालत में जबकि गुजरात सरकार अपने स्टेट पैनल के वकीलों को ही पिछले डेढ़ साल से उनका मानदेय दे पाने में असक्षम साबित हो रही हो, पर राघवन साहब को समझाए कौन, मोदी कुछ बोलेंगे तो कांग्रेस बोलेगी कि बोलता है।

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मगर गवर्नर सर…

Posted on 05 July 2010 by admin

शायद एम.के.नारायणन एकमात्र ऐसे गवर्नर हैं जो महामहिम के बगैर किसी औपचारिक मंजूरी के यूं दिल्ली में टपक जाया करते हैं अक्सर। सबसे पहले सोनिया गांधी से मिलते हैं, पीएम से मिलते हैं, प्रणबदा को ब्रीफ करते हैं। लगता है नारायणन कभी रिटायर ही नहीं हुए हैं अपनी उद्दात महत्वाकांक्षाओं से, उनका आचरण भी कमोबेश ऐसा ही है जैसे वह अब भी आईबी चीफ हों। वे केंद्रीय नेताओं को पश्चिम बंगाल सरकार की गुप्त सीआइडी रिपोर्ट, आने वाले विधानसभा चुनाव पर जरूरी फीड बैक, नक्सल समस्या के ताजा हालात और ममता दीदी के बारे में विस्तृत रिपोर्ट देते हैं। कांग्रेस जानती है कि वामपंथी दादाओं के मुकाबले तृणमूल दीदी पर नजर रखना कहीं ज्यादा जरूरी है, सो अभी नारायणन को भी पर्याप्त भाव मिल रहा है।

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गुरु के दिन गिनती के

Posted on 28 June 2010 by admin

रमजान शुरु होने से पूर्व संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी के फंदे पर लटकाया जा सकता है, गुरु की माफी की अर्जी केंद्र सरकार ने माननीया राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेज दी है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक ऐसी संभावना है कि राष्ट्रपति इस क्षमा अर्जी को नामंजूर करते हुए वापिस लौटा सकती हैं, अगर ऐसा हुआ तो इन कागजात को गृह मंत्रालय सेशन जज के पास भेज देगा। ऐसे में सेशन जज आमतौर पर इस पर ‘ब्लैक वारंट’ जारी करता है, जिसका बॉर्डर काले रंग का होता है, जिसमें फांसी की तयशुदा तारीख व समय मुकर्रर रहती है। यानी गिनती के दिन बचे है आतंकी गुरु के पास!

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अध्यक्ष की ड्रेस

Posted on 28 June 2010 by admin

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी जहां भी दौरे पर जाते हैं अपने साथर् कुत्ता-पाजामा ले जाना अब कभी नहीं भूलते, इस दफे पटना में जब वे एक रैली को संबोधित करने जा रहे थे वे स्थानीय मौर्या होटल से तैयार होकर जब बाहर निकले तो उन्होंने ऑलिव ग्रीन कलर की पैंट व हल्के हरे रंग की शर्ट पहन रखी थी, बिहार के एक प्रमुख भाजपाई नेता व नीतीश सरकार में मंत्री अश्विनी चौबे भागकर अध्यक्ष जी के पास पहुंचे और बेहद भाव-भक्तिपूर्ण अंदाज में कहा-‘आप किसी फिल्म स्टार से कम नहीं लग रहे?'(पीछे से किसी ने हौले से चुटकी ली-‘हां साउथ के ममूटी’)तब तक अन्य बिहारी नेतागण अध्यक्ष जी के पास जुट चुके थे और समवेत रूप से सबों की यही राय बनी कि अध्यक्ष जी पैंट-शर्ट पहनकर रैली में नहीं चलेंगे, इसके लिए तो झकाझक खादी का सफेदर् कुत्ता-पाजामा होना चाहिए?’ गडकरी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए तब कहा कि वे तो अपने साथर् कुत्ता-पाजामा लाए ही नहीं है। तब भागकर दो नेता वहां के स्थानीय फ्रेजर रोड मार्किट से अध्यक्ष जी के लिए दो जोड़ीर् कुत्ता-पाजामा खरीद लाए, उसे पहनने के बाद ही अध्यक्ष जी रैली को संबोधित करने के लिए प्रस्तर हुए। और उसी घटना के बाद गडकरी ने यह गांठ बांध ली कि चाहे जहां जाना हो साथ में सफेदर्-कुत्ता-पाजामा होना जरूरी है।

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