Posted on 21 August 2011 by admin
अरुण जेतली के सितारे इन दिनों बुलंदियों पर हैं, राज्यसभा में उनका भाषण सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर गया, लगता है उनकी एक पुरानी मांग अब बस परवान चढ़ने वाली है, जेतली का हमेशा से मानना रहा है कि जजों की नियुक्ति के लिए भारत को एक ‘नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन’ चाहिए, अभी यह काम ‘कॉलेजियम ऑफ जजेज’ के मार्फत होता है। सो सरकार ने भी ‘ज्यूडिशियल कमीशन’ के लिए पूरा मन बना लिया है।
Posted on 16 August 2011 by admin
‘कैश फॉर वोट’ मामले के चर्चित आरोपी संजीव सक्सेना ने भाजपा अध्यक्ष के करीबी और पार्टी के राष्ट्रीय सचिव श्याम जाजू पर कुछ गंभीर आरोप लगाए हैं। सक्सेना ने एक शपथ पत्र दाखिल कर कहा है कि उन्हें जो भी पैसे मिले थे वे उन्हें भाजपा मुख्यालय में श्याम जाजू ने दिए थे। उसके बाद उन्हें भाजपा के एक बड़े नेता के घर ले जाया गया था। जब वे अशोक अर्गल के घर पहुंचा तो भाजपा के यह शीर्ष नेता वहां भी मौजूद थे, जहां स्टिंग को सिरे चढ़ाया जा रहा था।
Posted on 07 August 2011 by admin
सो, पिछले दिनों जब भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती अडवानी के घर अपना दुखड़ा रोने पहुंची तो एक तरह से अडवानी उनके समक्ष बिल्कुल बेबस नजर आए, उमा ने अडवानी के आगे राजनाथ सिंह के कथित ठाकुरवाद की पोटली खोलने का साहस किया, उन्होंने अडवानी को बताया कि जब से राजनाथ सिंह को यूपी का विशेष ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है पार्टी में निरंकुश भाव से ठाकुरवाद का अभ्युदय हुआ है, राजनाथ सिंह, उनके चेले नरेंद्र तोमर और सौदान सिंह की तिकड़ी ने एक तरह से पार्टी की पूरी यूपी यूनिट को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। उमा की इस छटपटाहट पर अडवानी बस इतना कह पाए कि ‘ठीक है मैं गडकरी जी से बात करूंगा।’
Posted on 07 August 2011 by admin
अडवानी आहत हैं, आहत हैं कि उन्हें पार्टी से उनकी वफाओं का क्या सिला मिल रहा है, संघ के एजेंडे को सिर आंखों पर उठाने वाले उसके खास सिरमौर हर वह कोशिश कर रहे हैं कि आखिरकार कैसे पार्टी में अडवानी अप्रसांगिक होते जाएं। सो संघ के इस मंतव्य को अडवानी ने बखूबी पढ़ लिया है कि संघ की राय है कि अडवानी अगला चुनाव यानी 2014 में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ें। अडवानी खुद को इसके लिए तैयार करने में जुट गए हैं, अब उनका ज्यादा से ज्यादा वक्त पढ़ने-लिखने में बीत रहा है। वे ब्लॉक-लेखन को ज्यादा प्रवृत्त हो रहे हैं और अभी उनके लिखे तमाम ब्लॉग को एक संकलन के तौर पर रूपा एंड कंपनी एक पुस्तक के रूप में ला रही है-‘एज आई सी इट।’ जाने इस वयोवृध्द नेता के लिए और क्या-क्या देखना बाकी रह गया है?
Posted on 31 July 2011 by admin
येदुरप्पा के बगावती तेवरों से भाजपा सहम गई है। येदु ने धमकी दे रखी है कि वे क्षेत्रीय पार्टी बना लेंगे, येदु का कहना है कि वे कर्नाटक में पार्टी की जीत के शिल्पकार हैं, उन्होंने 2 से पार्टी को 122 विधायकों तक पहुंचाया है। भाजपा का राज्य में कभी जहां 0.4 प्रतिशत वोट शेयर हुआ करता था, उसे उन्होंने 35 फीसदी तक पहुंचाया है। येदु का कहना है कि अगर पार्टी ने उन्हें अपमानित किया तो राज्य के लिंगायत सोचेंगे यह उनका अपमान है। क्योंकि अकेले उत्तरी कर्नाटक में 25 से 30 फीसदी लिंगायत वोटर हैं। पूरे राज्य में लिंगायतों का अनुपात कोई 20 फीसदी है, तो वोकालिंगा 14.5 प्रतिशत के आसपास हैं। येदु कैंप 78 भाजपा विधायकों को अपने घर का मान रहा है, जो येदुरप्पा की कृपा से जीतकर आए हैं, इनका दावा है 22 विधायक ऐसे हैं जो मैनेज हो सकते हैं क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्रों में 15 से 20 हजार लिंगायत वोट हैं। बेंगलुरु शहर और तटीय कर्नाटक के 22 विधायक ऐसे हैं जो अपने दम पर जीतकर आए हैं, और जो संघ व अनंत कुमार के प्रभाव में हैं।
Posted on 31 July 2011 by admin
तेलांगना संकट से बाहर आने की कमान पार्टी ने अपने पुराने संकटमोचक गुलाम नबी आजाद को सौंपी है। आजाद आंध्र कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। इन दिनों आजाद ‘बैक बोन डिस्क प्रोब्लम’ (चलिए रीढ़ की हड्डी है तो!) से ग्रसित हैं, सो वे लगातार कुर्सी पर बैठ नहीं सकते। लिहाजा जब एक रायलसीमा डेलीगेशन उनसे मिलने आया तो उस प्रतिनिधिमंडल में दो डॉक्टर भी थे-डा. गीता रेड्डी व डा. एम.जगन्नाथम, बातचीत अभी शुरू ही हुई थी कि गुलाम दर्द से कराह उठे, दोनों डॉक्टरों ने फौरन कुछ दवाईयां और स्प्रे मंगवाया, तेलांगना का मुद्दा अब भटक कर गुलाम के दर्द पर सिमट आया था, दोनों डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई, उनकी दवाओं ने असर दिखाई, गुलाम का दर्द जाता रहा, पर तेलांगना की टीस यूं ही बनी रही।
Posted on 26 July 2011 by admin
सवाल अहम है आखिरकार सीबीआई की जांच की आंच में सिर्फ विपक्षी नेता ही क्यों तपते हैं, इसकी तपिश कांग्रेसी नेताओं तक क्यों नहीं पहुंचती? जैसे हवाला मामले में अडवानी, खुराना, यशवंत सिन्हा, शरद यादव आदि तो आय से अधिक संपत्ति मामले में मायावती, मुलायम, लालू, प्रकाश सिंह बादल, चौटाला, जयललिता और सीपीएम के पिन्नराई। अब जगनमोहन रेड्डी भी जब तक कांग्रेसी थे, सात खून माफ थे, जैसे ही कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई, आ गए सीबीआई जांच के दायरे में।
Posted on 26 July 2011 by admin
अमरीका में डा.गुलाम नबी फई का जैसे ही आईएसआई से संबंधों का खुलासा हुआ, भारत में भी कोहराम मच गया। प्रधानमंत्री के करीबी माने जाने वाले एक अखबार के पूर्व संपादक की अगुवाई में गठित तीन सदस्यीय पैनल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। सनद रहे यह वही पैनल है जो मनमोहन सिंह को लगातार यह सुझाव दे रहा था कि कश्मीर में 1953 से पूर्व की स्थिति बहाल कर दी जाए, अब इस बात का खुलासा हो गया है कि इस पैनल के सदस्यगण फई के खर्चे पर कई दफे अमरीका घूम आए थे, इसीलिए वे जो कह रहे थे अब उसकी पड़ताल में हमारी जांच एजेंसियां जुट गई है, क्या है उन बेनाम चेहरों की हकीकत, क्यों बिक जाते हैं वे हाथों हाथ? वैसे भी फई के बारे में अमरीका कहीं पहले से जानता था, खुलासा अब करने के पीछे उसकी मंशा भी जगजाहिर है।
Posted on 26 July 2011 by admin
एक ओर जहां मुलायम और कांग्रेस में खिचड़ी पक रही है, स्वयं राहुल बाबा मुलायम के प्रति साफ्ट नजरिया अपना रहे हैं, वहीं कुछ कांग्रेसी मंत्री मुलायम विरोधियों को ‘स्पांसर’ कर रहे हैं। वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी जिसने आय से अधिक संपत्ति मामले में मुलायम के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की थी, जो फिलवक्त दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में रहते हैं, उनके बच्चों का दाखिला आर्मी पब्लिक स्कूल में करवाया गया है और इनके बच्चों के गार्जियन बने हुए हैं कपिल सिब्बल, जो पहले से ही केंद्र में दोहरी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं।
Posted on 18 July 2011 by admin
यूपी की बाबत गडकरी ने 3 अलग-अलग एजेंसियों से सर्वेक्षण करवाए, वहां लोकप्रियता के ग्राफ में राजनाथ सिंह अव्वल आए, फिर वरुण गांधी और उमा भारती का नंबर आया। तब राजनाथ पर दबाव बनाया गया कि उन्हें यूपी में बतौर अगला सीएम प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ा जाए पर इसके लिए राजनाथ तैयार नहीं हुए। उनका ध्यान अब भी 2014 के चुनाव पर केंद्रित है। वे यूपी का प्रभारी बनने को भी राजी नहीं हुए (उनके चेले नरेंद्र सिंह तोमर पहले से ही यूपी के प्रभारी हैं) राजनाथ का तर्क था कि एक बार पार्टी अध्यक्ष बन जाने के बाद प्रभारी होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता, कुशाभाऊ ठाकरे व जना कृष्णामूर्ति भी अपने अध्यक्षीय कार्यकाल के बाद कभी प्रभारी नहीं बने (हां वेंकैया नायडू जरूर इसके एकमात्र अपवाद हैं), सो केंद्रीय नेतृत्व ने राजनाथ को यूपी और उत्तराखंड पर विशेष ध्यान देने की जिम्मेदारी सौंपी है, शायद इसीलिए कलराज मिश्र खम्म ठोंककर पत्रकारों को बता रहे हैं कि राजनाथ यूपी के प्रभारी नहीं हैं।