Posted on 03 October 2021 by admin
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यूं अचानक इस्तीफा देकर पंजाब का सियासी माहौल गर्मा दिया है, पीएम मोदी से उनकी निकटता को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि वे भगवा चोला भी ओढ़ सकते हैं। वहीं आम आदमी पार्टी से भी मनीष तिवारी के मार्फत उनके तार बकायदा जुड़े हुए हैं। सिद्धू के परिदृश्य में आने के बाद से ही लगातार पार्टी में कैप्टन का विरोध बढ़ता जा रहा था, कहते हैं कि पंजाब के कोई 63 कांग्रेसी विधायकों ने उनके खिलाफ विरोध का बिगूल फूंक रखा था। कयास लगाए जा रहे हैं कि फिलहाल सुनील जाखड़ को मुख्यमंत्री पद का जिम्मा सौंपा जा सकता है। कैप्टन को इस बात का बकायदा इल्म हो चुका था कि उनके कद को कांटने-छांटने की जो पूरी मुहिम थी उसे दिल्ली का समर्थन हासिल था, जिसकी अगुवाई सिद्धू कर रहे थे। राहुल-प्रियंका भी कैप्टन की अहंकारवादी शैली से खफा-खफा थे, कैप्टन किसी की सुनते नहीं थे, बस अपनी मन की करते थे। कुछ गिने-चुने विधायकों को छोड़ कर कांग्रेस के अधिकांश विधायकों की उनके पास पहुंचने की हिम्मत भी नहीं होती थी। कांग्रेस षीर्श ने इस बात का बखूबी आकलन कर लिया था कि कैप्टन के पार्टी छोड़ने से उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में कितना नुकसान उठाना पड़ेगा। सूत्र यह भी खुलासा करते हैं कि अगर कैप्टन ने एक बार भाजपा ज्वॉइन कर ली तो मोदी सरकार तीन कृषि कानूनों को रद्द कर कैप्टन के नेतृत्व में वहां चुनाव लड़ सकती है। क्योंकि पंजाब में भाजपा का कोई खास जनाधार नहीं है।
Posted on 03 October 2021 by admin
गुजरात में भाजपा नेताओं के एक वर्ग में गुस्सा उबाल मार रहा है कि दशकों से वे कमल को सिंचित करने में अपना खून-पसीना लगा रहे हैं पर जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आती है तो सर्वशक्तिमान किसी अनजाने से चेहरे पर दांव लगा देते हैं, जैसा कि कर्नाटक में बासवराज बोम्मई के चुनाव में हुआ, उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी का नंबर कैसे लग गया किसी को कानों कान खबर न हुई। अब हिमाचल और हरियाणा में भी सीएम बदलने के कयास सुने जा रहे हैं। रही बात गुजरात की तो यहां सीएम बदलने के बाद अब गाज भाजपा विधायकों पर गिरने वाली है, सूत्र बताते हैं कि दिल्ली और छत्तीसगढ़ वाला फार्मूला अब गुजरात में भी दुहराया जाएगा। सूत्रों की मानें तो केवल 5 फीसदी वर्तमान विधायकों को ही दुबारा टिकट दिया जाएगा यानी 90 फीसदी भगवा विधायकों की टिकट काटने की तैयारी है। गुजरात की 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के कुल 112 विधायक हैं, यानी इस गणना के मुताबिक तकरीबन 101 विधायकों के टिकट कट सकते हैं। भाजपा कर्णधारों का मानना है कि एंटीकम्बेंसी सरकार में व्यक्ति विशेष से होती है, तो व्यक्ति बदल दो तो मतदाताओं की नाराज़गी भी खत्म हो जाती है।
Posted on 03 October 2021 by admin
’माज़ी पर लिखी दास्तां में नहीं है सीरत मेरी
टूटे हुए आइनों से क्या पूछते हो सूरत मेरी’
संघ और भाजपा दोनों की निगाहें सहकारिता की जमीन पर सियासत के नए बीजारोपण पर लगी हैं, इसी हफ्ते नागपुर में संपन्न हुए अपने दो दिवसीय मंथन बैठक में संघ सहकारिता आंदोलन को धार देने के लिए अपने एक आनुषांगिक संगठन सहकार भारती को नई ऊर्जा से लबरेज करने की बात करता है, वहीं मोदी कैबिनेट के नए नवेले कोऑपरेटिव मंत्री अमित शाह सहकारिता के क्षेत्र के अपने पुराने अनुभवों को भगवा जमीन सिंचित करने में लगा रहे हैं। महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन के ध्वजवाहक शरद पवार से लेकर इस आंदोलन के जनक राज्यों में शुमार होने वाले केरल के नेताओं से भी शाह अपना राब्ता बढ़ाने में जुटे हैं। अभी हाल में ही यूपी के डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव के चुनाव शाह ने अपनी देखरेख में करवाए, जहां काफी हद तक भगवा वर्चस्व कायम हुआ है। सूत्रों की मानें तो शाह का अगला निशाना बिहार है जहां के कोऑपरेटिव पर काफी हद तक राजद का कब्जा है। यूं भी शाह का कोऑपरेटिव के साथ बेहद पुराना रिश्ता रहा है। नब्बे के शुरूआती दशक में जब अमित शाह भाजपा के एक मामूली से कार्यकर्ता थे और उनकी पहचान बस इतनी थी कि वे भाजपा के शीर्ष पुरूष लाल कृष्ण अडवानी के चुनाव एजेंट हुआ करते थे। यह वह दौर था जब कुशाभाऊ ठाकरे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। ठाकरे को शाह के संगठन कौशल पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अमित शाह को भाजपा के सहकारिता प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त कर दिया। यह वह वक्त था जब गुजरात के तमाम कोऑपरेटिव पर कांग्रेस का कब्जा था, यह उसी दौर की बात है जब ‘माधवपुरा मार्केटाइल कोऑपरेटिव बैंक’ डूबने की कगार पर था, और गुजरात के सबसे बड़े कोऑपरेटिव बैंक में शुमार होने वाला ‘अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक’ 36 करोड़ रूपए के घाटे में चल रहा था। शाह ने तब दिल्ली पहुंच कर अडवानी से गुहार लगाई कि अगर अहमदाबाद बैंक की बागडोर उन्हें सौंप दी गई तो वे इस बैंक को घाटे से उबार लेंगे। इसके तुरंत बाद ही 1999 में इस बैंक की बागडोर शाह को सौंप दी गई, इत्तफाक देखिए कि शाह ने महज़ एक साल के अंदर इस बैंक को 27 करोड़ रूपयों के मुनाफे में ला दिया। आज गुजरात के 22 कोऑपरेटिव बैंकों में से 20 पर भाजपा का वर्चस्व है। पीएम मोदी की सियासी बाजीगरियों का ही यह एक वृहतर आयाम था कि उन्होंने अपने नवगठित सहकारिता मंत्रालय की बागडोर अपने सबसे भरोसेमंद शाह को सौंप दी।
Posted on 03 October 2021 by admin
कईयों के लिए संघ का यह इंकार चौंकाने वाला था, जब संघ ने एक सिरे से पांचजन्य को खारिज करते हुए कह दिया कि यह हमारा मुख्यपत्र नहीं। सूत्र बताते हैं कि पांचजन्य अब तक नई दिल्ली के झंडेवालान के केशवकुंज में आश्रय पाता रहा था, वहीं स्थापित रह संघ के मूल विचारों को शब्दों का जामा पहनाता रहा था, उसके दफ्तर को आनन-फानन में दिल्ली के मयूर विहार फेज-2 इलाके में शिफ्ट कर दिया गया है। पांचजन्य अखबार का अगर इतिहास देखें तो आपका यह इल्म पुख्ता होगा कि टेक्नोलॉजी जैसे विषय पर अब तक कभी इस प्रकाशन ने कोई कवर स्टोरी नहीं की है। उस वक्त भी नहीं जब मोदी सरकार के आईटी मंत्री के ट्विटर अकाऊंट को ही इस अमरीकी कंपनी ने ‘सस्पेंड’ कर दिया था। फिर इंफोसिस क्यों? सही मायनों में इंफोसिस भारत की वह पहली आईटी कंपनी है जिसने आईटी को लेकर विश्व बाजार में भारत के वर्चस्व का ध्वजारोहण किया है। जब इंकम टैक्स और जीएसटी के नए पोर्टल को तैयार करने की जिम्मेदारी इंफोसिस को सौंपी गई थी तब क्या वह एक देशभक्त कंपनी नहीं थी? कंपनी ने वित्त मंत्रालय को साफ कह दिया था कि वह तय समय से पहले इन पोर्टल के काम को पूरा नहीं कर पाएगी तो फिर पहले सीआईए के एक कांफ्रेंस में पीयूष गोयल, फिर बाद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इस कंपनी को लानते-मानतें भेजने की जरूरत क्यों आ पड़ी? सादगी पसंद नारायण मूर्ति जिन्हें आम तौर पर दाल-रोटी खाना पसंद है वह वित्त मंत्री द्वारा दिए गए हैवीडोज को पचा नहीं पाए और बातों ही बातों में वे याद दिलाना नहीं भूले कि उनके दामाद ऋषि सुनक भी ब्रिटेन के वित्त मंत्री हैं। सूत्र बताते हैं कि ब्रिटिश एयरवेज की दिल्ली-लंदन फ्लाइट की इकॉनोमी क्लास की 22 एफ सीट नारायण मूर्ति के लिए हमेशा रिजर्व रहती है, अपनी इसी उड़ान में उन्होंने कई बड़ी बिजनेस डील को क्रैक किया है। मूर्ति ने लंदन की यही फ्लाइट पकड़ते देश के कर्णधारों से साफ कर दिया था कि या तो इंफोसिस के बारे में वे अपनी धारणा बदलें, वरना उन्हें भी अपनी धारणा बदलने को मजबूर होना पड़ेगा। सो, फौरन संघ ने इस कंपनी की तारीफ में कसीदे पढ़ दिए।
Posted on 03 October 2021 by admin
’तेरी बातों में जैसे हर बात देखा है
कच्चे दीयों में मैंने अंधेरी रात देखा है
तुम कह देते तो मान लेता चांद को भी सूरज
क्यों तेरे हाथों में दुश्मनों का हाथ देखा है’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने अक्स को एक बेहतर आसमां मुहैया कराने में जुटा है। अभी नागपुर के स्मृति मंदिर कैंपस में शुक्रवार और शनिवार को दो दिवसीय संघ की समन्वय बैठक आहूत थी। इस बैठक में संघ के तमाम आनुषांगिक संगठनों के सचिवों की मौजूदगी देखी गई, भाजपा की ओर से पार्टी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष भी वहां कदमताल करते नज़र आए। कहने को तो केंद्र सरकार के काम-काज की समीक्षा भी इस बैठक का एक प्रमुख एजेंडा था, पर ज्यादातर समय इस बैठक में संघ के चेहरे-मोहरे को नया रूप-रंग देने की बात हुई। भले ही संघ ने अपने इस चिंतन बैठक को अनौपचारिक बताया हो पर इसमें कई गंभीर मुद्दों पर औपचारिक चर्चा हुईं। खास कर किसानों के मुद्दों को लेकर संघ नेतृत्व गंभीर दिखा, सो संघ ने अपने दोनों महत्त्वपूर्ण संगठन जो किसान हित की अलख जगाते हैं, यानी ’भारतीय मजदूर संघ’ और ’किसान सभा’ को खास तवज्जो दी। किसानों की फसलों के उच्चतम समर्थन मूल्य को लेकर संघ के ये आनुषांगिक संगठन 8 सितंबर को धरना देंगे। संघ को यह भी लगता है कि अगर किसानों से सही नेटवर्क स्थापित करना है तो इसके लिए ‘कॉपरेटिव मूवमेंट’ को ज्यादा बल देना होगा, महाराष्ट्र में यह स्पेस एनसीपी और कांग्रेस ने पहले से कवर कर रखी है। इस बैठक में यह भी तय हुआ है कि संघ अपने एक प्रमुख आनुशांगिक संगठन ’सहकारी भारती’ को और मजबूत बनाएगा और इसके आधार को भी व्यापक बनाने के प्रयास होंगे। संघ नेतृत्व जानता है कि कॉआपरेटिव आंदोलन को मजबूती देकर संघ महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जमीनी स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ बना सकता है। इस चिंतन बैठक में एक बड़ा निर्णय लेते हुए यह भी साफ किया है कि अब वह एक बदले अवतार में लोगों के सामने आएगा, इसके लिए एक बड़ा मंत्र और ध्येय संघ ने तय किया गया है कि वह अब अपना ’लिबरल इमेज’ सामने रखेगा, मुस्लिमों के दिल में अपने प्रति सोच को बदलने का काम करेगा। पांच राज्यों में आहूत हालिया विधानसभा चुनावों में यानी यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में संघ की इसकी बदली सोच के दीदार होने शुरू हो जाएंगे। संघ प्रमुख मोहन भागवत सांप्रदायिक सौहाद्र्र को केंद्र में रख कर अपने नए आख्यानों की शुरूआत करेंगे। इस कड़ी में भागवत का पहला व्याख्यान 6 सितंबर को मुंबई में सुना-देखा जा सकता है, जब पुणे की एक संस्था ’ग्लोबल स्ट्रेटजी एंड पॉलिसी फाऊंडेशन’, राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहाद्र्र को लेकर एक अहम सेमिनार आयोजित कर रही है जिसमें भागवत ’राष्ट्र सर्वप्रथम’, ’राष्ट्र सर्वोपरि’ विषय पर बोलेंगे। भागवत के अलावा दो अन्य मुस्लिम वक्ता भी इस सेमिनार में अपने विचार रखेंगे, वे हैं आरिफ मोहम्मद खान और लेफ्टिनेंट जनरल सैय्यद अता हुसैन।
Posted on 28 August 2021 by admin
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने पचास से ज्यादा समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में डटे थे। वहीं उनके प्रबल विरोधी और उनकी सरकार के हेल्थ मंत्री टी एस सिंहदेव भी ढाई-ढाई साल के सत्ता के फार्मूले को अंजाम देने के लिए दिल्ली में डेरा-डंडा लगाए बैठे थे। भूपेश बघेल की सोनिया-राहुल से अहम मुलाकात के बाद लगभग यह तय हो गया है कि उनकी सत्ता आगे भी बनी रहेगी, ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के फार्मूले को एक तरह से कांग्रेस शीर्ष ने नकार दिया है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया ने साफ कर दिया है कि ’ऐसा कोई फार्मूला बना ही नहीं था।’ तो सवाल उठता है कि बघेल और सिंहदेव दोनों ने राहुल गांधी से पूर्व में दो-दो मुलाकातें क्यों की? सवाल यह भी उठता है कि यह ढाई-ढाई साल के सीएम का फार्मूला आखिर आया कहां से? सूत्रों की मानें तो जब ढाई साल पहले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी थी तो भूपेश बघेल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे और टीएस सिंहदेव कैंपेन कमेटी के चैयरमेन। तब छत्तीसगढ़ से एक मात्र कांग्रेस के सांसद थे तमरध्वज साहु, जिन्हें पार्टी का ओबीसी चेहरा भी माना जाता है। प्रदेश में ओबीसी जातियों की एक बड़ी तादाद है, जिसमें कोई 20 प्रतिशत आबादी कुर्मी जाति की है और कोई 16 प्रतिशत साहु हैं। तब बघेल और सिंहदेव दोनों का यह डर सता रहा था कि सीएम की रेस में कहीं साहु बाजी ना मार जाएं, सो इन दोनों ने साहु को गेम से बाहर रखने के लिए आपस में हाथ मिला लिया, और ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर आपसी रज़ामंदी कर ली, पर पार्टी हाईकमान को इस बारे में अंधेरे में रखा गया, आज यही रौशनी फूट कर बाहर आ रही है, साहु अब भी राज्य के महज गृह मंत्री हैं।
Posted on 28 August 2021 by admin
’कभी आज़ाद ख्यालों से हर शै गुलज़ार थी तेरी महफिल
आज क्यों तोहमत लगाती नज़रें ढूंढ रही गुनहगार को’
अगर अमृता प्रीतम के शब्दों में कहें तो ’गुलज़ार एक बहुत प्यारे शायर हैं, जो अक्षरों के अंतराल में बसी हुई खामोशी की अज़मत को जानते हैं’ और इस शायर के बारे में एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि इन्होंने अपने ख्यालों को कभी सत्ता की चेरी नहीं बनने दिया। कांग्रेस के जमाने में इन्होंने ’आंधी’ बनाई, ’किस्सा कुर्सी की’ कहानी लिखी, जब दिल्ली में निज़ाम का चेहरा भगवा हुआ तब भी इनका विद्रोह वैसे ही आकार लेता रहा। मोदी सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी जिनकी सियासी तुकबंदियां समां बांध देती हैं, वे पिछले दिनों मुंबई जाकर शायर, लेखक और फिल्ममेकर गुलज़ार से उनके पाली हिल स्थित बंगले पर मिले। शुरूआती हिचकिचाहटों के बावजूद गुलजार खुलने लगे और यह मुलाकात घंटे भर से ऊपर की रही। दरअसल, नकवी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मान्य एजेंडे को ही ध्यान में रख कर काम कर रहे थे, जिसमें संपर्क-संवाद-समन्वय के भाव को आगे बढ़ाया जाता है। केंद्र सरकार भी चाहती है कि उन शायर, कवि, लेखक, फिल्ममेकर से संवाद का रास्ता खुले जिनका रूझान किंचित वामपंथ की ओर है। कहते हैं इस मुलाकात में गुलजार ने मंत्री जी को एक नायाब सुझाव दिया। गुलजार का कहना था ’अगर भारत में बदलाव की इबारत लिखनी है तो इसके लिए शिक्षा ही सबसे बड़ी माध्यम हो सकती है।’ इन्होंने बताया कि आज भी दक्षिण के राज्यों में जब कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो उसके लिए एक खास तरह की पूजा होती है। देश में 14 नवंबर को ’बाल दिवस’ और 5 सितंबर को ’शिक्षक दिवस’ मनाने की परंपरा तो पहले से है, पर हम कोई ’शिक्षा दिवस’ क्यों नहीं मनाते? ’शिक्षा दिवस’ मनाने से गांव-गांव में और हर घर को यह संदेश जाएगा कि जीवन में अगर आगे बढ़ना है तो शिक्षित होना उतना ही अनिवार्य है। सूत्रों की मानें तो यह आईडिया पीएम मोदी को भी बेतरह रास आया है, केंद्र सरकार जल्द ही इस आशय की घोषणा कर सकती है। सुनने में आ रहा है कि इसके लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्म दिवस को चुना जा सकता है। और उक्त तारीख को ‘शिक्षा दिवस’ मनाने की घोषणा हो सकती है।
Posted on 28 August 2021 by admin
’चूहे कितने बड़े हो गए हैं, इतने कि
बिल से बाहर निकल आई है उनकी पूंछ
इतना जी भर के कुतरा है देश को
फिर भी ताव दे रही है उनकी मूंछ’
अगले साल आहूत होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद अहम हैं, सो इसकी तैयारियों में हर दांव आजमाए जा रहे हैं, जीत के पुराने मंत्रों को ठंडे बस्तों से निकालने के बाद उन्हें मांजा और चमकाया जा रहा है। अब सुनने में आया है कि यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर भाजपा अपने ‘विस्तारकों’ की नियुक्ति करने जा रही है, जो सीटें सहयोगी दलों मसलन अपना दल (सोनेवाल) जैसी छोटी पार्टियों के लिए छोड़ी जाएंगी, वहां भी सहयोगी दलों की आपसी सहमति से विस्तारकों की नियुक्ति होगी। पार्टी ने यह भी साफ कर दिया है कि विस्तारक बनने के इच्छुक अभ्यर्थी चुनाव नहीं लड़ेंगे। पार्टी के विधायक, सांसद या एमएलसी मौजूदा या रिटायर कोई भी विस्तारक बन सकता है पर जिन्होंने कम से कम 15 से 20 साल पार्टी की सेवा में लगाया हो। कमोबेश इसी तर्ज पर भाजपा 2017 का यूपी विधानसभा का पिछला चुनाव भी लड़ चुकी है। पर ’विस्तारक’ पद्दति के ईजाद का श्रेय संघ को जाता है जो पिछले कई दशकों से इस प्रक्रिया को अपना कर विधानसभा या लोकसभा चुनावों में भाजपा को मजबूती देता रहा है, और वह विस्तारक ही है जो पन्ना प्रमुखों से लेकर पोलिंग बूथ एजेंट तक के सीधे संपर्क में रहता है। जब 2014 में भगवा आभामंडल में मोदी काल का अभ्युदय हुआ तो अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ने यह तय किया था कि देशभर के कोई चार-साढ़े चार हजार विधानसभा सीटों पर भाजपा अपने विस्तारक की नियुक्ति करेगी, पर लगता है संघ को भाजपा का यह आइडिया उतना रास नहीं आया, क्योंकि वह पहले से ही इस पद्दति को अपनाता आया था, लिहाजा पार्टी ने भी संघ से किसी भी प्रकार के तकरार को टालने के लिए अपनी विस्तारक योजना ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। लेकिन जब से दत्तात्रेय होसाबोले संघ के नंबर दो पद पर आसीन हुए हैं उन्होंने नए विचारों के लिए संघ के खिड़की-दरवाजे खोल दिए हैं, उन्हें लगता है कि अगर भाजपा और संघ सामांतर रूप से ’विस्तारक नीति’ पर काम करें तो इससे जीत की संभावनाओं को और बेहतर आसमां मिलेगा, सो संघ की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद भाजपा अपने ’विस्तारक अभियान’ को धार देने में जुट गई है।
Posted on 28 August 2021 by admin
तृणमूल नेत्री और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी इन दिनों यशवंत सिन्हा से कुछ खफा-खफा सी लग रही हैं, नहीं तो उन्होंने सिन्हा से वादा किया था कि ’वह उन्हें ऊपरी सदन में भेजेंगीं,’ लेकिन जब यह मौका आया तो उन्होंने सिन्हा की जगह अप्रत्याशित तौर पर जवाहर सिरकार को वह सीट दे दी। यह सीट दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफा देकर भाजपा ज्वॉइन करने से खाली हुई थी, सिन्हा से ममता की नाराज़गी की मुख्य वजह यह है कि उन्होंने दिल्ली में शरद पवार के घर पर अपने ’राष्ट्र मंच’ के बैनर तले विपक्षी नेताओं की मीटिंग बुला ली थी, जबकि काएदे से वे तृणमूल के सदस्य हैं, इस नाते उन्हें टीएमसी का ही बैनर इस्तेमाल करना चाहिए था। वहीं ममता को कहीं न कहीं ऐसा भी लगता है कि राज्य में चूंकि अब विधानसभा चुनाव खत्म हो गए हैं सो उनके लिए सिन्हा की कोई खास उपयोगिता नहीं रह गई है, वैसे भी वे 80 साल से ऊपर के हो चुके हैं सो उनसे सक्रिय राजनीति में बने रहने की ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती है।
Posted on 28 August 2021 by admin
’सितारों से गुफ्तगू मेरी इस कदर होती है
तेरी किस्मत की सबसे पहले खबर होती है’
भारत की एक शीर्ष खुफिया एजेंसी को अपने जीवन के बेहतरीन सत्ताईस साल देने के बाद एक दिन इस शख्स को ऐसा लगा कि ग्रह-नक्षत्रों से उनका तारतम्य, उनकी बोलचाल इस कदर हो गयी कि अब नौकरी उनके इस प्रेम में आड़े आ रही है, तो वे अपनी जमी-जमायी नौकरी से वीआरएस लेकर ज्योतिषीय गणना के कार्य में जुट गए। राहु की दशा को अपनी गणना का आधार बना कर गुड़गांव के इस ज्योतिषी ने 19 फरवरी 2019 को ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि 2020 आते-आते दुनिया एक रहस्यमयी बीमारी की चपेट में आ जाएगी यह बीमारी आगे चल कर एक महामारी का रूप ले सकती है। अब जाकर पक्के तौर पर यमझा जा सकता है तब ज्योतिषी हसीजा कोरोना के खतरे के बारे में ही चेता रहे थे। राजेश हसीजा ज्योतिष शास्त्र को एक विज्ञान मानते हैं और कहते हैं कि भारत में बस इसे एक कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। हसीजा की माने तो पीके के रूप में राहुल को उनका अहमद पटेल मिल गया है। राहुल गांधी की जन्मकुंडली को खंगालने के बाद इस ज्योतिषी का कहना है कि अभी राहुल की राहु की महादशा में राहु की अंतर्दशा चल रही है, जो इस दिसंबर तक चलेगी। इसके बाद मई 2024 तक राहुल की बृहस्पति की अंतर्दशा रहेगी जो उनकी कुंडली में पराक्रम को दर्शाता है। इनका दावा है कि आने वाले दिनों में राहुल विपक्ष के एक भारी-भरकम नेता के तौर पर उभरेंगे और वे विपक्ष की एक महत्वपूर्ण धुरी के तौर पर कार्य करेंगे। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में ज्योतिष महोदय की भविष्यवाणी है कि वे लंबे समय तक बंगाल की मुख्यमंत्री बनी रहेंगी पर उनकी कुंडली में पीएम बनने का योग नहीं है। भाजपा के एक प्रमुख नेता और पीलीभीत के सांसद वरूण गांधी के बारे में उनकी भविष्यवाणी है कि वरूण पूरे दम-खम के साथ वापसी करेंगे और उन्हें उनकी सियासी प्रतिभा का इनाम भी मिलने वाला है, इस वर्ष 23 सितंबर के आस-पास उनको पार्टी की ओर से कोई बड़ा पद ऑफर हो सकता है। देश की कुंडली को लेकर राजेश हसीजा को किंचित चिंता है, इनके मुताबिक भारत का लग्न आरोही वृष राशि में 7 डिग्री पर आगे बढ़ रहा है, अक्टूबर के बाद जब राहू और केतु दोनों ही 7 डिग्री पर स्थिर हो जाएंगे तो इसका दुष्प्रभाव नवंबर के तीसरे सप्ताह से दिखने लगेगा, क्योंकि राहु भारत के लग्न में भी विराजमान हैं। इसका अर्थ है चहुंओर वित्तीय अराजकता, बाजार धड़ाम से गिरेगा और कुछ ऐसा गिरेगा कि लोग हैरान रह जाएंगे। बड़े अरबपतियों और करोड़पतियों पर भी संकट के बादल मंडराने लगेंगे। वित्तीय घोटालों की नयी अनुगूंज सुनाई देगी, व्यापारिक घरानों के बीच नए ’कॉरपोरेट वॉर’ का आगाज़ मुमकिन है, हमारी लड़खड़ाती इकोनॉमी को कोरोना की तीसरी लहर डंसने को तैयार बैठी होगी। राजेश हसीजा चेतावनी भरे लफ्ज़ों में कहते हैं कि ‘अक्टूबर के अंत और नवंबर माह में तमाम जरूरी सावधानियां बरतने को तैयार रहें, क्योंकि हम चौकसी रख कर ही दुश्मन को हरा सकते हैं।’