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बिहार में भाजपा की गुटबाजी उफान पर

Posted on 24 April 2022 by admin

अभी हाल में संपन्न हुए एमएलसी चुनाव में बिहार में भाजपा की आपसी गुटबाजी खुल कर सतह पर आ गई, जिसका खामियाजा पार्टी को इन चुनावों में भी उठाना पड़ा। इसी गुटबाजी की वजह से भाजपा के कई उम्मीदवार खिसक कर तीसरे स्थान पर जा पहुंचे। हाईकमान भले ही इस बात के लिए स्वयं अपनी पीठ थपथपा रहा हो कि उसने सुशील मोदी को बिहार से दर-बदर कर पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी पर नकेल कस दी हो, पर सच तो यह है कि सुशील मोदी दिल्ली में बैठ कर अपने समर्थकों के लगातार संपर्क में हैं। और यहीं दिल्ली में बैठे-बैठे बिहार की भगवा राजनीति में लुत्ती लगा रहे हैं। इस दफे के एमएलसी चुनाव में भूपेंद्र यादव बनाम सुशील मोदी गुट में साफ लड़ाई दिखी। यहां तक कि भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल जो बेतिया के हैं, वे अपने गढ़ पश्चिमी चंपारण में ही मुंह की खा गए। यहां राजद का उम्मीदवार जीत गया, कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही और भाजपा फिसल कर तीसरे नंबर पर जा गिरी। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राधा मोहन सिंह के गृह जनपद मोतिहारी में भी कुछ-कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, यहां कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज करा ली, राजद दूसरे नंबर पर और भाजपा यहां भी तीसरे स्थान पर रही। एक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय के सीवान में भी कमोबेश यही नज़ारा देखने को मिला। यहां भी राजद ने अपना परचम लहरा दिया और मंगल पांडेय का उम्मीदवार यहां भी फिसड्डी साबित हुआ और वह तीसरे स्थान पर रहा। अब भाजपा नेता कह रहे हैं कि ‘भूमाई’ समीकरण यानी भूमिहार, मुसलमान और यादव गठबंधन की वजह से राजद को इन चुनावों में बढ़त मिल गई। इन चुनावों में एक नारा खास तौर पर आकर्शण का वजह रहा ’ग्वार-भूमिहार, भाई-भाई’ यानी यादव और भूमिहार गठबंधन यहां की राजनीति में एक नई ताकत बन कर उभरा है।

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कांग्रेसी क्षत्रपों का पार्टी शीर्ष से मोल-तोल

Posted on 24 April 2022 by admin

ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि कर्नाटक के विधानसभा चुनाव समय से पूर्व हो सकते हैं। वैसे तो कर्नाटक के विधानसभा चुनाव मई 2023 में होने हैं, पर भाजपा की योजना कर्नाटक के चुनाव गुजरात चुनावों के साथ इस दिसंबर माह में कराने की है। पांच में से चार राज्यों में भगवा पताका लहराने के बाद भाजपा और संघ के हौसले बम-बम हैं और पार्टी को कहीं न कहीं ऐसा भी लगता है कि हिजाब के मुद्दे पर राज्य में तेजी से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ है, माहौल भाजपा के पक्ष में बना है सो, इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए। मामले की नज़ाकत को भांपते हुए कर्नाटक कांग्रेस के एक कद्दावर नेता डीके शिवकुमार पिछले दिनों राहुल और प्रियंका गांधी से मिले। सूत्र बताते हैं कि इन दोनों नेताओं के समक्ष शिवकुमार ने प्रस्ताव रखा है कि ’अगर उन्हें कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस अपना सीएम फेस ‘डिक्लेयर’ करती है तो वे विधानसभा चुनाव में पार्टी का सारा चुनावी खर्च उठाने को तैयार है।’ राहुल-प्रियंका ने उनके इस प्रस्ताव पर अभी हामी नहीं भरी है। दिलचस्प है कि इसी तर्ज पर गुजरात के आसन्न विधानसभा चुनावों को मद्देनज़र रखते चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी कुछ ऐसा ही प्रस्ताव राहुल-प्रियंका के समक्ष रखा है। पीके दोनों भाई-बहन से मिलने जब पहुंचे तो उनके साथ लेहुआ पाटीदार समुदाय के एक बड़े नेता और व्यवसायी नरेश पटेल भी थे। समझा जाता है कि पीके का प्रस्ताव भी कमोबेश डीके शिवकुमार वाला ही था, कि अगर नरेश पटेल को कांग्रेस गुजरात चुनाव में अपना सीएम फेस घोषित कर दे तो यहां भी पार्टी का सारा खर्च पटेल उठा लेंगे। प्रियंका ने चुटकी लेते हुए पीके से कहा-’गुजरात चुनाव में तो अभी देर है, पहले पार्टी के केंद्रीय कोष की ही कुछ मदद हो जाए।’ पीके ने भी मजाक-मजाक में प्रियंका से कह दिया-’हम तो आपको दीदी बुलाते थे, पर यह आइडिया तो ’बहिनजी’ (मायावती) का लग रहा है।’

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क्या आजमगढ़ से डिंपल यादव लड़ेंगी?

Posted on 24 April 2022 by admin

इस बार संसद सत्र के दौरान यूं अचानक संसद के गलियारे में असदुद्दीन ओवैसी सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से टकरा गए, एक पल को दोनों की नज़रें मिलीं और ओवैसी ने आगे बढ़ कर तपाक से अखिलेश को गले लगा लिया। पहले तो अखिलेश ने शिकायतों का पिटारा खोलते हुए कहा कि उनकी पार्टी एआईएमआईएम ने इन यूपी चुनावों में सपा का कितना नुकसान किया है। पर ओवैसी की मुद्रा थी ’चलो अब आगे बढ़ते हैं।’ फिर ओवैसी की पार्टी के गुड्डू जमाली के बसपा के हाथ थामने पर अखिलेश ने कहा-’मैंने आपसे कहा था इनको (जमाली को) मेरे पास भेजो, मैं इन्हें एमएलसी बना दूंगा, पर आपने मेरी बात सुनी नहीं।’ ओवैसी कुछ बोले नहीं, बस मुस्कुराते रहे। दरअसल, आजमगढ़ लोकसभा सीट से अपना इस्तीफा देने के बाद अखिलेश के लिए उप चुनाव में यह सीट उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। बसपा के मुबारकपुर के पूर्व विधायक गुड्डू जमाली उर्फ शाह आलम फिर से लौट कर बसपा से दांव आजमा रहे हैं। जमाली की उम्मीदवारी ने अखिलेश की पेशानियों पर बल ला दिए हैं, क्योंकि यह एक बड़े बिल्डर हैं, पैसे की कोई कमी नहीं, मुस्लिमों में एक लोकप्रिय चेहरे हैं और इस यूपी चुनावों में ओवैसी ने जो 100 उम्मीदवार उतारे थे, उनमें से 99 की जमानत जब्त हो गई, बस जमाली ही चौथे स्थान पर रह कर अपनी जमानत बचा पाए थे। भाजपा की योजना शिवपाल यादव को अखिलेश से तोड़ कर उन्हें आजमगढ़ से अपना उम्मीदवार बनाने की है, जिससे कि यादव परिवार और यादव गढ़ में दोफाड़ हो सके। अखिलेश के आगे बस यही विकल्प बचता है कि या तो वे अपनी पत्नी डिंपल यादव को आजमगढ़ से मैदान में उतारें या फिर वहां के सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव पर दांव लगाएं, पर जो भी हो इस बार आजमगढ़ उप चुनाव का नज़ारा बेहद दिलचस्प होने जा रहा है।

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अखिलेश की नज़र 2024 पर

Posted on 19 March 2022 by admin

सपा प्रमुख अखिलेश यादव मैनपुरी की करहल सीट से इस दफे जीत गए हैं, पर वे अपनी विधानसभा की सीट छोड़ कर अपनी सांसदी बरकरार रखना चाहते हैं। अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव ने करहल से अखिलेश को जिताने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, अब शिवपाल चाहते हैं कि अखिलेश की इस छोड़ी हुई सीट से वे अपने पुत्र आदित्य सिंह को इस उप चुनाव में करहल से मैदान में उतारेंगे, पर लगता है अखिलेश के मन में कुछ और ही चल रहा है। उन्होंने आनन-फानन में अपने चाचा को विधानसभा में विपक्ष का नेता घोषित कर दिया है, जिससे वे इस मुद्दे पर अखिलेश पर कोई दबाव न बना सके। अखिलेश ने अपने चाचा को समझाया है कि ’आदित्य को लेकर उनके पास कुछ बड़ी योजना है, वे 2024 के लोकसभा चुनाव में आदित्य को सपा के सिंबल पर मैदान में उतारना चाहते हैं।’ रही बात करहल की तो यहां से तीन बार के विधायक रह चुके सोबरन सिंह भी एक बार फिर से इस सीट पर अपना दावा ठोक रहे हैं। पर अखिलेश के मन में कुछ और चल रहा है। वे करहल से पिछड़ों के एक प्रमुख नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को उप चुनाव में जितवा कर लखनऊ भेजना चाहते हैं। स्वामी प्रसाद जो भाजपा से सपा में आए हैं इस बार फाजिल नगर से चुनाव हार गए थे। अखिलेश दरअसल अपनी गैर यादव पिछड़ा कैमिस्ट्री को और मजबूत करना चाहते हैं। अखिलेश को इस बार के चुनाव में छोटे दलों से गठबंधन का बड़ा फायदा मिला, इस गठजोड़ की बदौलत ही सपा के वोट प्रतिशत में एक जबर्दस्त उछाल दर्ज हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा का कुल वोट षेयर जहां मात्र 21.08 फीसदी था, वह बढ़ कर 22 के यूपी चुनाव में 32.06 प्रतिशत हो गया है। यानी अखिलेश के वोट षेयर में जहां डेढ़ गुना का इजाफा हुआ है वहीं उनकी विधानसभा में सीटें ढाई गुना तक बढ़ गई है। अखिलेश इस उछाल को 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बरकरार रखना चाहते हैं।

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भाजपा में मिल सकते हैं कई दल

Posted on 19 March 2022 by admin

‘सवालों के झुरमुठ हैं, अनिश्चय की धुंध है
जहां सत्य नहीं उगते, ये उन आत्माओं की ठूंठ है
जब से तेरी अंतरात्मा उनकी हुई है गला अवरुद्ध है
भले राह कितनी भी मुश्किल है, चलना जरूर है’

इस बदलते मौसम में जैसे पीली धूप ने भी अपना लिबास बदल कर गेरूआ कर लिया हो, 10 तारीख को जब मतों का डिब्बा खुला तो कई पार्टियों की उम्मीदें भी डब्बा हो गईं, भाजपा ने अपनी दुलकी चाल से भले ही अपने विरोधियों को धूल चटा दी हो, पर कई सवाल अब भी अनुतरित रह गए हैं। जैसा कि कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि ’नरेंद्र मोदी की यह जीत भीतर से भुरभुरी है, क्योंकि पांच राज्यों के ताज़ा चुनावी नतीजे आने से पहले इन कुल 690 सीटों में से भाजपा के पास पहले से 399 सीटें थीं, अब नतीजों के बाद यह 356 रह गईं हैं यानी 43 सीटें कम हो गई हैं।’ पर पूछा तो यह भी जाना चाहिए कि कांग्रेस के अपने नैतिक बल का क्या हुआ? पंजाब की जीती-जिताई बाजी उसने आप के हाथों सौंप दी, उत्तराखंड में जीत का आह्वान हार के हाहाकार में कैसे तब्दील हो गया? यूपी में ’लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के प्रियंका की हुंकार को जनता ने क्यों अस्वीकार कर दिया? लिहाजा आज आत्ममंथन की जरूरत भाजपा को नहीं कांग्रेस को है, जिसके कई बड़े नेता अब भी टूटने को तैयार बैठे हैं। इन पांच में से चार राज्यों में विपक्षी पताका लहराने के बाद भगवा हौंसले बम-बम है, भाजपा की योजना इस साल के आखिर तक कम से कम तीन दलों का विलय भगवा पार्टी में कराने की है। बहन मायावती तो इस बात के लिए तैयार बताई जाती हैं, जिन्होंने डंके की चोट पर इस दफे के चुनाव में अपना 70 से 80 फीसदी कोर वोट बैंक सीधे भाजपा में ट्रांसफर करा दिया, उनकी नज़र राजनीति से एक सम्मानजनक विदाई पर है, उनकी निगाहें राष्ट्रपति पद पर हैं, पर अगर वह नहीं मिला तो बहिन जी उप राष्ट्रपति पद पर भी मान सकती हैं, तमाम मुकदमों से पीछा छूटेगा और एक चैन की संवैधानिक जिंदगी बसर कर पाएंगी। अगर ऐसा होता है तो वह अपनी पार्टी बसपा का विलय भी भाजपा में करने को तैयार हो सकती हैं। कमोबेश यही हाल नीतीश कुमार का है, उनकी पहली कोशिश तो केंद्र में विपक्षी एका का चेहरा बनने की थी, उन्होंने दुबारा इस बाबत पीके से संपर्क भी साधा, अपने लिए संभावनाएं भी टटोली, पर दाल अगर गली नहीं तो वे भी भगवा समर्पण के लिए सहज़ तैयार हो सकते हैं, यानी अगर वे राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति बनाए जाते हैं तो वे अपनी पार्टी जदयू का विलय भाजपा में करने को तैयार हो सकते हैं, जिसका प्रभाव अब बस बिहार तक सीमित रह गया है। एक पुरोधा और हैं वीआईपी पार्टी वाले मुकेश सहनी, इनकी चर्चा आगे है।

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’एक देश, एक चुनाव’ की अटकलें तेज

Posted on 19 March 2022 by admin

पीएम मोदी का यह पुराना आइडिया ’वन नेशन, वन इलेक्शन’ चार राज्यों में भाजपा की बंपर जीत के बाद फिर से हिलौरे मारने लगा है। मोदी पहले भी कहते रहे हैं कि ’संसदीय चुनाव और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ होने चाहिए, इससे देश का काफी पैसा बचेगा।’ पीएम मोदी कोई चार साल पहले यह आइडिया लेकर सामने आए थे। अकेले 2019 के लोकसभा चुनाव पर ही 60 हजार करोड़ से ज्यादा का खर्च आया था। कहते हैं देश का चुनाव आयोग भी पीएम की इस राय से इत्तफाक रखता है, पर ऐसा करने के लिए अन्य राजनैतिक दलों के बीच एक आम सहमति बनाने की जरूरत होगी, बल्कि ऐसा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में भी संशोधन करना होगा। तो क्या अभी संपन्न हुए 5 राज्यों के चुनाव 2024 में दुबारा होंगे?

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जावड़ेकर, प्रसाद व गंगवार को मिल सकती है गवर्नरी

Posted on 27 February 2022 by admin

’बरसों साथ रहते हैं लोग, पर कोई रिश्ता कायम नहीं होता
कुछ हवाओं पर सवार आते हैं, और हमारा वजूद महका जाते हैं’

कहते तो यही हैं कि सियासत तो कोठेवालियों का दुपट्टा है जो किसी के आंसुओं से तर नहीं होता। पर यह कहावत अब गए दौर की बात हो गई है, सियासत का अंदाज भी बदला है और इसकी तासीर भी। अब पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार को ही ले लीजिए, इस बात से उनका हौंसला टूट गया था इस दफे के यूपी चुनाव में लाख मशक्कत के बाद भी वे अपनी बेटी के लिए एक अदद भगवा टिकट का जुगाड़ नहीं कर पाए। निराशा कुछ इस हद तक परवान चढ़ी कि गंगवार साहब ने सीधे भाजपा के नंबर दो अमित शाह को ही फोन लगा दिया, उन्होंने शाह के समक्ष अर्ज किया-’आठ बार का सांसद हूं, पर अपनी बेटी को एक टिकट तक नहीं दिलवा पाया।’ सूत्रों की मानें तो शाह ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए ’संतोश’ रखने को कहा, साथ ही यह भी कहा कि ‘आप दिल छोटा न करो, हम आपके लिए कुछ बड़ा सोच रहे हैं, आप राजभवन में जाने की तैयारियां शुरू कर दो।’ गंगवार के चेहरे से एकबारगी ही सारी उदासी छंट गई, ठीक वैसे ही जैसे जब उम्मीदों का चांद निकलता है तो आसमां से गहरे, काले बादल छंट जाते हैं। यूपी के बाद आइए अब पटना चलते हैं, मिलते हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से, जब से उनकी कुर्सी गई है वे संघ और भाजपा के विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी सक्रियता के दीदार करवा रहे थे। सुना जा रहा है कि संघ ने उन्हें बुला कर इत्तला दे दी है कि अब उन्हें राजनैतिक मंचों से दूरी बना लेनी चाहिए, क्योंकि आने वाले दिनों में उन्हें एक अहम जिम्मेदारी मिलने जा रही है, जिसका स्वरूप गैर राजनीतिक हो सकता है, पर यह पद संवैधानिक होगा। प्रसाद भी संघ का इशारा समझ गए हैं कि उन्हें भी गवर्नरी का प्रसाद मिलने जा रहा है। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं, सौम्य और मृदुभाषी प्रकाश जावड़ेकर। जो रोजाना नियम से भाजपा मुख्यालय आ रहे थे और यहां घंटों समय व्यतीत कर रहे थे। उन्होंने मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर को भी उनकी उम्मीदवारी वापिस लेने के लिए मनाने की कोशिश की पर देवेंद्र फड़णवीस की वजह से बात बनी नहीं। अब सुना जा रहा है कि जावड़ेकर को भी इशारा मिल गया है कि उन्हें एक अहम राज्य का गवर्नर बनाया जा सकता है। यानी आने वाले दिनों में नए महामहिमों की बाढ़ आने वाली है।

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क्या शाह के हाथों में फिर से होगी पार्टी की कमान?

Posted on 27 February 2022 by admin

10 मार्च के बाद भाजपा कम से कम अपने तीन प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को बदलने का इरादा रखती है यानी कर्नाटक, हिमाचल और त्रिपुरा। सूत्रों की मानें तो संघ के बड़े नेताओं से बातचीत में स्वयं अमित शाह ने स्वीकार किया कि ’हिमाचल में भाजपा का उद्धार सिर्फ जेपी नड्डा ही कर सकते हैं, उनके चेहरे पर ही इस दफे राज्य का चुनाव लड़ना होगा। अगर नड्डा सचमुच शिमला चले गए तो सूत्रों का कहना है कि उनकी जगह अमित शाह भाजपा के एक बार फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं। ऐसा हुआ तो शाह भाजपा की कमान संभाल अभी से 2024 के आम चुनाव की तैयारियों में जुट जाएंगे।’ सूत्रों की मानें तो कर्नाटक के सीएम बोम्मई कई बार पीएम और शाह से गुहार लगा चुके हैं कि ’कर्नाटक का सुपर सीएम यानी बीएल संतोष तो दिल्ली में बैठे हैं, सभी महत्वपूर्ण निर्णय वे वहीं से लेते हैं सो, बोम्मई के पास करने के लिए कुछ खास बचता नहीं।’ कहते हैं इसके बाद पीएम ने संतोष से बेहद व्यंग्यात्मक लहज़े में बात की और कहा कि ’उत्तराखंड में हमने 3 सीएम बदले उसका हश्र सबके सामने हैं, अब कम से कम कर्नाटक को भी उत्तराखंड मत बनाइए।’ रही बात त्रिपुरा की तो वहां के युवा सीएम बिप्लब देब का अपने विधायकों में ही विरोध दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है, आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाइएगी।

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क्या बिहार में भी ‘एकला चलेगी’ कांग्रेस?

Posted on 19 February 2022 by admin

राहुल और प्रियंका दोनों चाहते हैं कि यूपी की तरह अब बिहार में भी कांग्रेस को उसके अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके, इसके लिए दोनों भाई-बहन लालू या नीतीश नामक बैसाखी नहीं चाहते। इसी रणनीति के तहत ही बिहार विधान परिषद के लिए होने वाले 24 सीटों के चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने 8 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। वहीं बिहार के बड़े कांग्रेसी नेता अपने सगे-संबंधियों को टिकट दिलवाने के लिए लालू-नीतीश की परिक्रमा में व्यस्त थे। बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा अपने पुत्र के टिकट के लिए तेजस्वी के आगे-पीछे डोल रहे थे तो वहीं अखिलेश सिंह अपने पुत्र के लिए लगातार लालू की परिक्रमा में जुटे थे। वैसे स्वयं लालू इस बात के लिए तैयार बताए जा रहे थे कि वे कांग्रेस के लिए एक-दो सीट छोड़ देंगे बशर्ते स्वयं राहुल उनसे इस बात के लिए आग्रह करें। वहीं राहुल करप्षन के मुद्दे पर जीरो-टाॅलरेंस की पाॅलिसी चाहते हैं, और ये राहुल ही थे जिन्होंने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते वह ‘ऑर्डिनेंस’ फाड़ दिया था, जिसकी वजह से आज भी लालू यादव को जेल के दीवारों के पीछे कैद रहना पड़ रहा है। लालू से कोई बात किए बगैर राहुल ने अपने विश्वासी के.राजू को पर्यवेक्षक बना कर बिहार भेज दिया और राजू की रिपोर्ट के बाद ही कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है।

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तेजस्वी का सूर्या वाला तेज

Posted on 19 February 2022 by admin

भाजपा शीर्ष भारतीय युवा मोर्चा के अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या में अपने भविष्य का सूरज देख रही है और उसे दक्षिण में अपना ’पोस्टर ब्याॅय’ बनाने के लिए कृतसंकल्प जान पड़ती है। इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर इन्हें लोकसभा में बोलने का भी मौका दिया गया, जिसमें सूर्या ने अपने अद्भुत ज्ञान से सदन में समां बांध दिया, उनके दो बोल आप भी सुन लीजिए-’देश में कोई बेरोजगारी नहीं है, अगर कोई बेरोजगार हैं तो वह कांग्रेस का युवराज (राहुल) है। मोदी जी जीते तो उन्होंने देश को परिवारवाद और समाजवाद से मुक्ति दिलाई।’ भाई परिवारवाद तक तो ठीक है, समाजवाद से क्यों मुक्ति दिलवा रहे हो? आपकी पार्टी तो अपने आम बजट में भी समाजवाद की झलक देखती है। भाजपा के नए नेतृत्व ने ही सूर्या को हिंदुत्व के नए ’पोस्टर ब्याॅय’ के तौर पर उभारा, अनंत हेगड़े के मुकाबले उन्हें ज्यादा तरजीह दी गई, यहां तक कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल चुनाव में भी सूर्या को अपना स्टार प्रचारक बना कर उतारा। दरअसल, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जानता है कि उसे 2024 के चुनावों में कुछ नए राज्यों की डिस्कवरी करनी होगी, ये राज्य दक्षिण या फिर नार्थ ईस्ट के ही हो सकते हैं। क्योंकि 2019 के चुनाव में भाजपा को यूपी में 65, बिहार में 39, पश्चिम बंगाल में 18 सीटें मिली थीं, सो यह ग्राफ और ऊपर जाने वाला नहीं सो अब पार्टी की नज़र कर्नाटक, आंध्र, केरल, तेलांगना जैसे राज्यों पर है, जहां काफी मुस्लिम आबादी भी है सो भाजपा को यहां ध्रुवीकरण की राजनीति रास आ रही है। जैसे कर्नाटक में भगवा गमछा बनाम हिजाब की राजनीति से भाजपा को फायदा हुआ है। काॅलेजों में भी तिरंगा की जगह भगवा झंडा फहराने से भाजपा इसमें अपना लाभ देख रही है। तेजस्वी सूर्या जैसे हिंदुत्व के चेहरे को आगे बढ़ाने में भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोश का भी बड़ा हाथ बताया जा रहा है। सूर्या के अंकल रवि पहले से ही राज्य के भाजपा विधायक भी हैं।

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