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सोनिया से मिल कर पहले ही अपने मंसूबे बता चुके थे आजाद

Posted on 04 September 2022 by admin

’तुझे यूं भुलाने में हमें जमाने लगे हैं, तेरे दर से जाने में हजारों बहाने लगे हैं
कहानियों सी सुनता रहा तुम्हें अब तलक, आज अलाव में सारे फ़साने लगे हैं’
कांग्रेस को अलविदा कहने के कोई दो सप्ताह पूर्व गुलाम नबी सोनिया से मिले थे और उनके समक्ष अपने मन की व्यथा कहते हुए उन्होंने अपनी आगे की रणनीति के खुलासे भी कर दिए थे। बकौल गुलाम नबी-’राहुल गांधी की स्वीकार्यता देश में कम है और कार्यकर्ताओं में तो उससे भी कम है। मैं 74 साल का हो गया हूं, मुझे और किसी चीज की तमन्ना नहीं।’ गुलाब नबी ने अपना दर्द सोनिया से साझा करते हुए आगे कहा-’मैंने इंदिरा जी के साथ काम किया है, राहुल मेरे बच्चे की उम्र के हैं। आखिरी बार जब मैं उनसे आनंद शर्मा और भूपिंदर सिंह हुड्डा के साथ मिला तो राहुल ने अपने सहायक से कहा-’गेट गुलाम नबी ए कप ऑफ टी’ मैडम हम पुराने संस्कारों वाले लोग हैं, ऐसा सुनने की हमारी आदत नहीं है। आप भी तो मुझे आजाद साहब कह कर संबोधन देती हैं।’ फिर बातों ही बातों में जब प्रियंका गांधी का जिक्र आया तो सोनिया के समक्ष आजाद ने खुल कर अपनी राय रखी और कहा-’मैं नहीं कहता कि प्रियंका के आने से कोई जादू हो जाएगा, पर हां वह कांग्रेस के लिए एक तुरूप का पत्ता साबित हो सकती हैं। प्रियंका व्यवहार कुशल हैं और जो भी व्यक्ति उनके पास अपनी समस्या लेकर जाता है वह उनसे मिल कर संतुष्ट हो जाता है।’ विश्वस्त सूत्र ने बताया कि गुलाब नबी की पूरी बात सुनने के बाद सोनिया ने कहा-’राहुल पचास से ऊपर के हो रहे हैं और उन्होंने अपना पूरा ‘यूथ’ पार्टी को दे दिया है, वे दिन-रात एक कर मेहनत कर रहे हैं, इस वक्त उन्हें हटाने से उन पर हमेशा के लिए ’नकारा’ का ठप्पा लग सकता है, ऐसा मैं होने नहीं दूंगी।’ कहते हैं इस पर गुलाम नबी ने यह कहते हुए सोनिया से विदाई ली-’मैडम, आप सिर्फ अपने बेटे के लिए सोच रही हैं, देश और पार्टी के लिए नहीं सोच रही हैं।’

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पुराने संजय वफादारों को एक कर रहे हैं आजाद

Posted on 04 September 2022 by admin

गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जो 5 पेज का लेटर भेज कर कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की है, इस पत्र में सीधे-सीधे उन्होंने कांग्रेस की इस दुर्दशा के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया है। दिलचस्प तो यह कि गुलाम नबी के इस पत्र में राजीव गांधी से कहीं ज्यादा संजय गांधी का जिक्र हुआ है। पहले दो पन्नों के अलावा पत्र के आखिरी पन्ने पर भी संजय के नायकत्व का बखान हुआ है। पत्र के मजमून को देख कर ऐसा लगता है कि गुलाम नबी की नई पार्टी में पुराने संजय वफादारों को भी अहम जगह मिल सकती है। इस पत्र में गुलाम नबी ने अपने राजनैतिक कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए संजय के साथ अपने नजदीकी संबंधों का जिक्र किया है, बकौल गुलाम नबी-’छात्र जीवन से ही मैं आजादी की अलख जगाने वाले गांधी, नेहरू, पटेल, बोस और अबुल कलाम आजाद के विचारों से प्रभावित था। संजय गांधी के कहने पर मैंने 1975-76 में जम्मू-कश्मीर यूथ कांग्रेस की अध्यक्षता संभाली। संजय गांधी की दुखद मृत्यु के बाद 1980 में मैं यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बना।’ आजाद ने कांग्रेस लीडरषिप पर ऐसे समय सवाल उठाए हैं जब कांग्रेस ’भारत जोड़ो यात्रा’ की तैयारियों में जुटी है, क्या यह इस बात की ओर इशारा है कि गुलाम नबी की उद्दात महत्वाकांक्षाओं की डोर का रंग निहायत भगवा हो गया है।

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दीदी के ठाकुर से मिले स्वामी

Posted on 04 September 2022 by admin

पिछले दिनों सुब्रह्मण्यम स्वामी जब मन में राज्यसभा की चाह लिए कोलकाता पहुंचे तो वहां उनकी बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से एक लंबी मुलाकात हुई। यह मुलाकात कोई घंटे भर चली। सूत्रों की मानें तो दीदी ने स्वामी से कहा कि ’अगर वे उनकी पार्टी ज्वॉइन कर लें तो पार्टी भी बदले में उन्हें पूरा सम्मान देगी।’ पर सीधे स्वामी के राज्यसभा को लेकर ममता ने कुछ नहीं कहा। इसके बाद ममता ने स्वामी को अपना निजी मंदिर दिखाया और अपने ठाकुर जी के दर्शन कराए। ममता ने स्वामी के समक्ष अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि ’लोग समझते हैं कि मैं नास्तिक हूं, पर मेरे ठाकुर जी ही मेरे संसार हैं।’ ममता के आतिथ्य से खुश हो कर स्वामी दिल्ली लौट आए हैं और उन्होंने बकायदा ट्वीट कर ममता की तारीफों के पुलींदे भी बांध दिए हैं, पर वे अभी तक तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें टीएमसी ज्वॉइन करनी है या नहीं, क्योंकि अगले साल ममता के पास राज्यसभा की तीन सीटें आने वाली हैं।

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गडकरी पर यह सितम क्यों?

Posted on 04 September 2022 by admin

नितिन गडकरी भाजपा के शायद एकमेव ऐसे नेताओं में शुमार हैं जिनकी कथनी व करनी की एकरुपता का हिंदुस्तान लोहा मानता है, मोदी सरकार के किसी एक मंत्री का अगर सबसे शानदार ट्रैक रिकार्ड रहा है तो वे गडकरी ही हैं। संसद में वे जब बेधड़क बोलते हैं तो विरोधी दलों की शाबाशियां भी बटोर ले जाते हैं। 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार दिल्ली के निज़ाम पर काबिज हुई तो गडकरी के पास 7 अहम मंत्रालय थे जो आज की तारीख में घटते-घटते मात्र एक रह गया है सड़क व राष्ट्रीय राजमार्ग। सूत्रों की मानें तो गडकरी के अपने नैतिक साहस के अलावा उन्हें नागपुर से मिल रहा समर्थन भी अहम था। पर जैसे-जैसे नागपुर भी मोदी की विराट काया के समक्ष नतमस्तक होता चला गया भगवा सियासत में गडकरी की पूछ कम होती चली गई। लोग भूले नहीं होंगे जब 2019 में उन्होंने खुल कर कह दिया था-’जो आदमी यह समझता है कि वही सब कुछ जानता है, वह गलती पर है, लोगों को ‘आर्टिफिशियल मार्केटिंग’ से बचना चाहिए।’ शायद गडकरी को भी इस बात का भली-भांति इल्म रहा होगा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ क्यों सौतेला सलूक कर रहा है, इसीलिए जब पूरी भाजपा व संघ नेहरू को गरियाने में लगे थे, वे नेहरू की तारीफ में कसीदे पढ़ देते हैं। अभी पिछले महीने जुलाई में नागपुर के एक कार्यक्रम में गडकरी ने खुल कर मन के उद्गार व्यक्त कर डाले और कहा-’देश की राजनीति इस कदर खराब हो गई है कि कभी-कभी उनका मन करता है कि वे राजनीति से संन्यास ले लें।’ उन्होंने आगे कहा-’आज की राजनीति पूरी तरह से सत्ता में बने रहने के लिए हो रही है।’ सूत्रों की मानें तो जब इस दफे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने फोन कर गडकरी को बताया कि उन्हें संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से इस बार ड्रॉप किया जा रहा है तो गडकरी ने बेझिझक नड्डा को फोन पर खूब खरी-खोटी सुना दी। कहते हैं पार्टी में गडकरी से सहानुभूति रखने वाले काफी लोग हैं, गडकरी वक्त आने पर इसका खुलासा भी कर सकते हैं।

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क्या जजपा और भाजपा की राह जुदा होगी

Posted on 15 August 2022 by admin

पिछले सप्ताह हरियाणा में भाजपा की एक समीक्षा बैठक हुई जिसमें मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के अलावा संघ के कई प्रमुख नेता, पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता गण और संगठन मंत्री शामिल हुए। दरअसल, यह बैठक हरियाणा के हालिया निकाय चुनाव के नतीजों के मंथन के लिए बुलाई गई थी। कुल 46 निकायों में भाजपा 22 पर, जजपा महज़ 3 पर और 19 पर निर्दलियों ने जीत दर्ज कराई थी। ‘जननायक जनता पार्टी’ यानी जजपा से जीते तीनों उम्मीदवार भी वही हैं जो पहले भाजपा से टिकट मांग रहे थे, इसीलिए जजपा की 12 में से 3 जीत को भाजपा कोई खास तवज्जो नहीं दे रही है। सो, इस मंथन बैठक में यह विचार हुआ कि क्यों नहीं चौटाला परिवार से बात कर जजपा का विलय भाजपा में करने को कहा जाए क्योंकि जाटों की पार्टी माने जाने वाली जजपा से स्वयं जाटों ने दूरी बना ली है, जजपा लोकसभा की दो सीटें हिसार और सिरसा 24 के लोकसभा के लिए अभी से भाजपा से मांग रही है, पर भाजपा शायद ही इसके लिए तैयार हो।

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पार्था पर ममता का दांव गलत

Posted on 15 August 2022 by admin

पिछले दिनों जब तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी दिल्ली में थीं तो उन्होंने अपनी पार्टी के राज्यसभा सांसद सुधांशु शेखर राय के घर पर अपने खास कोर ग्रुप की एक अहम बैठक बुलाई, इस चाय बैठक में सौगत राय, सुधांशु शेखर राय और अभिषेक बनर्जी जैसे तृणमूल सांसद शामिल थे। ममता ने अपने पार्टी सांसदों से अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि ’वह जब भी पार्टी के विस्तार के बारे में सोचती हैं, कोई उनके इस विचार को धरातल पर नहीं उतार पाता।’ ममता ने गोवा को इसकी सबसे बड़ी मिसाल बताया। ममता ने अभिषेक को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ’जब पार्था का ‘नोट कांड’ सामने आया तो आपने बगैर सोचे-विचारे उसे तुरंत पार्टी से बर्खास्त कर दिया, आज स्थिति यह है कि वह केंद्रीय एजेंसियों के हाथों में खेल रहा है। लोग बताते हैं कि वह ‘अप्रूवर’ बनने को भी तैयार हैं।’ दरअसल, ममता को यह चिंता सता रही है कि उनके इतने करीबी रहे पार्था अगर केंद्र सरकार के हाथों खेलने लग जाएंगे तो यह जांच की आंच निजी तौर पर उन्हें भी प्रभावित कर सकती है।

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कौन है हिमाद्री सिंह?

Posted on 15 August 2022 by admin

शुक्रवार को ही संसद में एक और नज़ारा देखने को मिला जब शहडोल से भाजपा सांसद हिमाद्री सिंह अपनी तय सीट छोड़ कर आगे की पंक्ति में जाकर बैठ गईं, उनकी इस गलती के लिए सबसे पहले उनका ध्यान खींचा विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने, इसके बाद टिहरी-गढ़वाल की महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह 37 वर्षीया हिमाद्री के पास उठ कर आईं और उनसे कहा कि ’क्या आपको मालूम है कि आप जिस सीट पर बैठी हैं कभी यहां प्रखर नेत्री सुषमा स्वराज बैठा करती थीं?’ हिमाद्री ने ’ना’ में सिर हिलाया। सनद रहे कि हिमाद्री 2019 में पहली बार सांसद चुनी गई हैं। 19 के चुनाव में भी यह अपने लिए कांग्रेस से टिकट मांग रही थीं, पर कांग्रेस ने कहा कि उन्हें यानी हिमाद्री को अपने पति को भी कांग्रेस ज्वॉइन करवानी होगी, पर हिमाद्री के पति जो उस वक्त भाजपा में थे इस बात के लिए तैयार नहीं हुए, तब हिमाद्री ने भाजपा के टिकट पर ही चुनाव लड़ लिया और कांग्रेस की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को चार लाख से ज्यादा वोटों से हराया। उस वक्त वह मां बनने वाली थीं, चुनाव प्रचार भी उन्होंने इसी हालत में किया। चुनाव जीतने के बाद उन्हें एक बेटी हुई। सनद रहे कि हिमाद्री के पिता दलवीर सिंह आदिवासियों के एक बड़े नेता में शुमार होते थे, वे गांधी परिवार के करीबी थे और कोई तीन बार केंद्र में मंत्री भी बने थे।

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जयराम की जगह कौन?

Posted on 06 August 2022 by admin

हिमाचल प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक आहूत थी। इस बैठक में भाजपा के प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, अनुराग ठाकुर, भाजपाध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे। खन्ना का स्पष्ट तौर पर मानना था कि ’हिमाचल के वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को बदलना आवश्यक है। उनकी जगह दिल्ली से किसी कद्दावर नेता को शिमला भेजना ही होगा।’ इस पर षेखावत ने कहा कि अनुराग ठाकुर एक बेहतर पसंद हो सकते हैं। यह सुनते ही जेपी नड्डा के चेहरे की भावभंगिमा बदल गई, इस बात को सबसे पहले अमित शाह ने भांपा, उन्होंने बात संभालते हुए कहा-’वैसे तो हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी से बेहतर और कोई च्वॉइस नहीं हो सकती, पर हिमाचल जाने में इनकी दिलचस्पी नहीं है, वैसे भी हम इन्हें वहां का सीएम बना कर इनका ‘डिमोशन’ नहीं करना चाहते।’ शाह की बात सुन कर एक पल तो नड्डा भी भौच्चक रह गए कि इस बात पर आखिरकार उनकी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।

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पीएम की अदा पर फिदा हुए सिंगापुर के मंत्री

Posted on 17 July 2022 by admin

8 जुलाई को विज्ञान भवन में ‘अरुण जेटली मेमोरियल लेक्चर’ आहूत था, जिसमें बतौर मुख्य वक्ता सिंगापुर के सीनियर थरमन शनमुगारत्नम को अपना लेक्चर डिलीवर करना था। जेटली का पूरा परिवार मंच के नीचे पहली पंक्ति में बैठा था और उसी पंक्ति में सिंगापुर के इस सीनियर मंत्री को भी बिठाया गया था। पीएम तयशुदा वक्त पर सभागार में पधारे, आम तौर पर वे सीधे स्टेज पर ही अवतरित होते हैं, पर उस रोज मानक परंपरा को तोड़ते हुए पीएम सबसे पहले जेटली परिवार से मिले, फिर स्टेज पर गए। स्टेज पर पहुंचने के बाद उन्होंने जब नीचे निगाह डाली तो पाया कि सिंगापुर के यह मंत्री दर्शक दीर्घा में बैठे हुए हैं। उस समय स्टेज पर पीएम की अगवानी के लिए महज़ देश की फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण उपस्थित थीं। पीएम ने उनसे उसी वक्त शनमुगारत्नम को स्टेज पर लाने को कहा। फौरन अधिकारी हरकत में आए और सिंगापुर के मंत्री को स्टेज पर लाया गया। पर इसके बाद पीएम के हाव-भाव बता रहे थे कि वे प्रोटोकॉल की इस व्यवस्था से खुश नहीं हैं। जो गणमान्य लोग इस लेक्चर को सुनने के लिए खास तौर पर पधारे थे, उनमें अनुराग ठाकुर, रवि शंकर प्रसाद, पी के मिसरा, राजीव शुक्ला व रिवर्ज बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर की उपस्थिति देखी जा सकती थी, ज्यादातर केंद्रीय मंत्रियों की अनुपस्थिति भी हैरान करने वाली थी, कई वैसे भगवा चेहरे भी नदारद थे जिनकी प्रतिभा को जेटली ने पहचाना था और उन्हें एक मुकम्मल जगह तक पहुंचने में मदद की थी।

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राष्ट्रपति पद उम्मीदवार

Posted on 17 July 2022 by admin

आखिरकार झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो और वहां के सीएम हेमंत सोरेन ने एनडीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के समर्थन का ऐलान कर ही दिया। दरअसल, जब मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थीं और रघुबर दास वहां के सीएम, तो 2016 में भाजपा की रघुबर दास सरकार आदिवासी हितों की अनदेखी करती दो अहम विधेयक लेकर आई थी, एक ‘छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम’ और दूसरा ‘संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम’। जब यह विधेयक दस्तखत के लिए वहां की तत्कालीन गवर्नर द्रौपदी मुर्मू के पास आए तो मुर्मू ने यह कहते हुए इन दोनों विधेयकों पर साइन करने से इंकार कर दिया, और आदिवासी हितों का ध्यान रखने के लिए पुनर्विचार हेतु इन विधेयकों को सरकार के पास वापिस भेज दिया। कहते हैं इस बात का फायदा चुनावों में झारखंड मुक्ति मोर्चा को मिला और आदिवासियों के एकमुश्त वोट सोरेन की पार्टी को मिले। सो, मुर्मू की उम्मीदवारी का समर्थन सोरेन की मजबूरी बन गई थी।

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