Archive | January, 2012

बच गईं जिया

Posted on 24 January 2012 by admin

2 महीने पहले बांग्लादेश में भी खालिदा जिया के तख्ता पलट की सारी तैयारियां हो चुकी थीं, वहां की आर्मी जिनका भारत विरोधी रूख जगजाहिर है, उसने खालिदा को सत्ताच्युत करने की पूरी तैयारियां कर ली थी, वह तो भला हो भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ का जिसने समय रहते इसकी सूचना खालिदा तक पहुंचा दी और खालिदा ने आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल कर लिया।

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(English) No love for Imran from the US

Posted on 24 January 2012 by admin

अमरीका को नहीं प्यारे इमरान
पाकिस्तान में सेना संविधान के अंतर्गत तख्ता पलट चाहती है, मौजूदा सरकार वैसे भी वहां की आर्मी की पसंद की नहीं रही है। आर्मी इमरान खान को आगे कर रही है, उनकी सभाओं में भीड़ भी जुटा रही है, पर अमरीका को इमरान पसंद नहीं। मुशर्रफ भी 30 से पहले पाकिस्तान वापिस लौट सकते हैं। मुशर्रफ का मानना है कि चाहे जो हो जाए आर्मी उन्हें कभी जेल नहीं भेजेगी, वहीं रावलपिंडी में रहने देगी।

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कैसे आई पचौरी की बारी?

Posted on 24 January 2012 by admin

पर कृष्ण की नगरी मथुरा के पंकज पचौरी को न तो पुलक को रिपोर्ट करने से परहेज था और न ही भाषायी पत्रकारों से कोई खास एलर्जी, वैसे भी पंकज के हिंदी पत्रकारों से अच्छे रिश्ते हैं। इनकी पत्नी मराठी हैं, चुनांचे भाषायी पत्रकारों में भी इनकी पहुंच है। पर पीएमओ में अभी भी यह चर्चा चल रही है कि पंकज पीएम की आखिरी च्वॉइस नहीं है, जब तक खरे के स्थानापन्न की तलाश पूरी नहीं हो जाती है तब तक वे बने रहेंगे। लगता है कि यह खबर बाहर भी लीक हो गई है इसीलिए तो महज औपचारिक मुलाकात के लिए पंकज ने प्रणब मुखर्जी व अडवानी से जब मिलने का टाइम मांगा तो इन दोनों ही जगहों पर उन्हें निराशा हाथ लगी।

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क्यों गए खरे?

Posted on 24 January 2012 by admin

प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार हरीश खरे का जाना वस्तुत: हिंदी व अन्य क्षेत्रीय मीडिया की विरोध की वजह से था। उनकी बार-बार यह शिकायत आ रही थी कि खरे बेहद अंग्रेजी दां हैं, अड़ियल हैं व हिंदी तथा भाषायी पत्रकारों को तरजीह नहीं देते हैं। दस जनपथ बनाम सात रेस कोर्स की लड़ाई सार्वजनिक होने से और आए दिन इसके बारे में खबरें छपने से पीएम का खरे से पहले ही मोहभंग हो चुका था। सो, जब खरे से यह कहा गया कि अब वे पुलक चटर्जी को रिपोर्ट करें तो इसके लिए खरे राजी नहीं हुए। उनकी जिद थी कि वे बस पीएम को ही रिपोर्ट कर सकते हैं। तो ऐसे में उनके स्थानापन्न की तलाश शुरू हो गई। नाम तो प्रणय रॉय, भारत भूषण, आलोक मेहता, विनोद शर्मा आदि के चल रहे थे पर इन पत्रकारों की भी यही जिद थी कि वे पुलक को रिपोर्ट नहीं करेंगे।

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राज्यसभा की आस में पत्रकार

Posted on 24 January 2012 by admin

कांग्रेस की दहलीज पर कांग्रेस का एजेंडा आगे बढ़ाने वाले तमाम वरिष्ठ पत्रकारों ने धमा चौकड़ी मचा रखी है। हिंदुस्तान टाइम्स की शोभना भरतिया ने सोनिया गांधी से मिलकर पहले ही साफ कर दिया है कि उन्हें अपने लिए राज्यसभा की अगली टर्म नहीं चाहिए। जिन्हें चाहिए उनके नाम भी बड़े हैं और उनका दावा भी मजबूत है मसलन, विनोद शर्मा, आलोक मेहता, मृणाल पांडेय, राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि-आदि।

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बने रहेंगे गडकरी

Posted on 24 January 2012 by admin

तमाम प्रतिकूल सियासी झंझावतों से डूबते-उतरते भी भाजपा अध्यक्ष बम-बम हैं, और अपने मनचाहे डंडे से भगवा पार्टी को हांक रहे हैं। भाजपा को नियंत्रित व पथ निर्देशित करने वाले संघ ने नितिन गडकरी से साफ-साफ कह दिया है कि वे अगले टर्म की ताजपोशी के लिए तैयार रहें। 5 राज्यों के चुनावी नतीजे आने के तुरंत बाद भाजपा का एक ‘प्लेनेरी सेशन’ बुलाया जा रहा है, जिसमें पार्टी अपना संविधान संशोधन लेकर आने वाली है, इस संशोधन के मुताबिक भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल 3 वर्ष किया जा रहा है और पार्टी संविधान में ऐसी भी व्यवस्था लाई जा रही है कि पार्टी अध्यक्ष लगातार 2 टर्म यानी अपने कार्यकाल के 6 वर्ष पूरे कर सकता है। जबसे यह खबर गडकरी को लगी है अपने 100 किलो के वजन की परवाह किए बगैर वे आसमां में कुलांचे भर रहे हैं।

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जा सकते हैं आर्मी प्रमुख

Posted on 24 January 2012 by admin

आर्मी चीफ के उम्र विवाद पर अपनी खासी किरकिरी करा चुकी केंद्र सरकार अब अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है, देश दुनिया में यह पहला मौका है जबकि कोई निवर्तमान आर्मी प्रमुख अपनी ही सरकार के रक्षा मंत्रालय के खिलाफ कोर्ट में गया हो। कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में सेना प्रमुख की जन्मतिथि के मुद्दे पर किंचित गंभीरता से विचार हुआ। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि एक तरह से सरकार ने लगभग तय कर लिया है कि माननीय राष्ट्रपति इन्हें जाने के लिए कह सकती है, वैसे भी आर्मी प्रमुख सिंह का कार्यकाल-2 वर्ष के ऊपर हो गया है, और किसी आर्मी प्रमुख के कार्यकाल की अवधि नियत नहीं होती, यह तो देश के राष्ट्रपति के ऊपर निर्भर है (जो कि तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है) कि वह कब तक अपने सेनाध्यक्ष की सेवा लेना चाहते हैं। अमूमन इनकी रिटायरमेंट तक इनकी सेवा लेने की परंपरा है। पर कुछ खास परिस्थितियों में राष्ट्रपति अपने अधिकार का प्रयोग कर इनकी रूखसती पर मुहर लगा सकता सकती हैं। समझा जाता है कि यूपीए सरकार की इस मामले में राष्ट्रपति से पहले ही बातचीत हो चुकी है, बस इंतजार मुकदमे की पहली सुनवाई का है।

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उमा को ना

Posted on 14 January 2012 by admin

उमा को लेकर यूपी के भाजपा नेताओं में ही ‘ऊई मां’ मची है, भाजपा नेताओं का एक वर्ग उमा भारती को बुंदेलखंड की बबीना विधानसभा सीट से चुनाव लड़वाना चाहता था, पहले तो उमा इसके लिए तैयार नहीं थी पर पार्टी के केंद्रीय नेताओं के समझाने बुझाने से उमा मान गई थी, उमा से यह कहा गया कि अगर वह खुद चुनावी मैदान में होंगी तो इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा। वैसे भी बबीना उमा के लिए कोई मुश्किल सीट नहीं थी, क्योंकि यहां लोध वोटरों की तादाद सबसे ज्यादा है। जैसे ही उमा चुनावी मैदान में उतरने को तत्पर हुई कलराज मिश्र, विनय कटियार सरीखे यूपी भाजपा के नेताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया, उन्हें कहीं न कहीं डर था कि इससे तो उमा अपने को भगवा पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शुमार कर लेंगी। इन नेताओं का विरोध रंग लाया और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने तय किया है कि उमा अब सिर्फ 2014 का लोकसभा चुनाव ही लड़ेंगी, इस बारे में खुद उमा ने अभी तक अपना मंतव्य स्पष्ट नहीं किया है।

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उत्तराखंड में खेल फिक्सिंग का

Posted on 14 January 2012 by admin

लगता है उत्तराखंड में भाजपा व कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच एक सांठ-गांठ हो गई है, बतर्जे ‘तुम मेरी खुजलाओ, मैं तुम्हारी खुजलाता हूं’ सो कोई भी बड़ा नेता सामने वाली पार्टी के बड़े नेता के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहता, कमाल की बात तो यह है कि ये वही नेतागण हैं जो खम्म ठोंककर खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार साबित करने पर तुले हैं। मसलन उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रमुख नेता हरक सिंह रावत की परंपरागत सीट लैंस डाउन थी, पर वहां उत्तराखंड रक्षा मोर्चा के टीपीएस रावत के मैदान में आ जाने से उन्होंने दोईवाला का रुख कर लिया, पर वहां भूले भटके निशंक आ टपके। अब रावत निशंक से भी नहीं भिड़ना चाहते थे सो वे दबे पांव रुद्रप्रयाग चले गए। दिलचस्प तो यह है कि हरक सिंह के खिलाफ भाजपा ने जो अपना उम्मीदवार रुद्रप्रयाग में उतारा है, वे मतबार सिंह कंडारी हरक सिंह के नजदीकी रिश्तेदार हैं। रावत व कंडारी रिश्ते में जीजा-साले हैं। वैसे ही मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी के खिलाफ कांग्रेस ने कोटद्वार में कमजोर उम्मीदवार उतारा है, सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत कहते हैं भाजपा की मर्जी से रामनगर आई हैं, बाज की तेज नजर वाले यशपाल आर्य का बाजपुर आना भी कुछ ऐसी ही दास्तांबयानी करता है।

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राहुल का इंदिरा कार्ड

Posted on 14 January 2012 by admin

यूपी में अगड़ी जातियों खासकर ब्राह्मणों को लुभाने के लिए कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी अब ‘इंदिरा कार्ड’ चल रहे हैं। राहुल जानते हैं कि कुशवाहा प्रकरण से राज्य के अगड़े मतदाताओं में भाजपा की खूब किरकिरी हुई है, इस दफे के चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं का रूख भी तय नहीं है, उन्हें फ्लोटिंग वोटर्स माना जा रहा है जो क्षेत्र विशेष की हवा और प्रत्याशी को देखते हुए कहीं भी जा सकते हैं। राहुल जब इस दफे ब्राह्मण बहुल इलाकों में प्रचार कर रहे थे तो उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा का कुशवाहा प्रेम महज पिछड़े वोटरों को लुभाने का एक ढोंग भर था। राहुल ने लोगों को याद दिलाया कि वे इंदिरा गांधी के पोते व राजीव गांधी के बेटे हैं और वे यूपी में महज चुनाव जीतने नहीं आए हैं, यहां से उनका एक भावनात्मक रिश्ता भी है। कांग्रेस व राहुल को मालूम है कि यूपी में उनका कोई ‘वोट बैंक’ नहीं रह गया है, सो ऐसे समय में जबकि सपा, बसपा व भाजपा तीनों ही पार्टियां जहां पिछड़े वोटरों को लुभाने में जुटी है वहीं राहुल ने अपना फोकस सवर्ण मतदाताओं पर रखा है और कांग्रेसी युवराज ने कांग्रेस का प्रचार अभियान संभाल रही विज्ञापन एजेंसी से कहा कि वे खास सवर्ण मतदाताओं को ध्यान में रखकर अपना कोई ‘कैंपेन’ तैयार करें।

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