Archive | November, 2011

…और अंत में

Posted on 06 November 2011 by admin

लालू यादव ने लगता है जैसे बिहार से नाता ही तोड़ लिया है, अपना जन्मदिन हो या दिवाली और छठ जैसे बिहारियों के महापर्व, लालू ने दिल्ली में ही सेलिब्रेट किया, अब तो उनके बारे में इतना तक कहा जाने लगा है कि वे अगला लोकसभा चुनाव भी पश्चिमी दिल्ली से लड़ सकते हैं, जहां पूर्वांचली मतदाताओं की अच्छी तादाद है।

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क्या होगा लोकपाल का?

Posted on 06 November 2011 by admin

21 नवंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में कई महत्त्वपूर्ण विधेयक आने वाले हैं, जैसे जमीन अधिग्रहण बिल के पास होने की पूरी उम्मीद है, फूड सिक्युरिटी बिल भी आएगा, पर लोकपाल बिल को लेकर अभी भी संशय का माहौल बना हुआ है कि कौन सा लोकपाल बिल संसद में लाया जाएगा, अन्ना समर्थित जन लोकपाल या सरकार समर्थित संवैधानिक लोकपाल यह फच्चर अब भी फंसा हुआ है।

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बड़बोलेपन की कीमत

Posted on 06 November 2011 by admin

एक प्रमुख अंग्रेजी चैनल के हेड (जिन पर शरद यादव ने संसद में खुलेआम हल्ला बोला था) की नौकरी खतरे में है। देश के सबसे बड़े मीडिया समूहों में शुमार होने वाले इस चैनल के मालिकों ने अपने चैनल प्रमुख के प्रति सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है। समझा जाता है कि चैनल ने पीएफ घोटाले में एक जिला न्यायालय के जज की फोटो दिखाने के बजाए जस्टिस पी.वी.सावंत का फोटो दिखा दिया, सावंत प्रेस काऊंसिल के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सो, उन्होंने झट से 100 करोड़ के मान हानि का दावा चैनल पर ठोक दिया है, इस मामले में निचली अदालतों व हाईकोर्ट में मुंह की खाने के बाद चैनल के मालिक सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे हैं, कोर्ट ने चैनल को 20 करोड़ नकदी तथा 80 करोड़ की बैंक गारंटी जमा करने को कहा है। अब चैनल मालिकों को लग रहा है कि केंद्र सरकार के इतने मुखर विरोध का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है। गोया यह मामला अभी अदालत में लंबित है बावजूद इसके मालिकगण अपने चैनल हेड को बाहर का रास्ता दिखाने पर आमादा हैं।

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पीआर के धनी शुक्लाजी

Posted on 06 November 2011 by admin

यूं तो संसदीय राज्य मंत्री राजीव शुक्ला के जिम्मे राज्यसभा की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में मदद करना है, पर शुक्ला जन संपर्क के धनी नेताओं में शुमार होते हैं, सो कांग्रेस ने राज्यसभा के साथ-साथ लोकसभा के विपक्षी नेताओं के साथ भी लॉबिंग की जिम्मेदारी शुक्ला को सौंप दी है। सो इस बार दिवाली के मौके पर वे थोकभाव में दिवाली गिफ्ट के साथ विपक्षी नेताओं के घर पधारे। क्या बसपा, सपा या भाजपा वे तो लालू और शरद यादव से भी मिल आए। भाजपा में अरुण जेतली और सीपीएम में सीताराम येचुरी उनके अभिन्न मित्रों में से हैं, चुनांचे शुक्ला जी का तो उनसे मिलना-जुलना होता रहता है, शुक्ला की भांति ही जेतली को भी सियासत से अलहदा कई और खेल खेलने पसंद है मसलन क्रिकेट सो शुक्ला जी से उनकी टयूनिंग जबर्दस्त है। सिर्फ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज से शुक्लाजी नहीं मिल पाए जबकि सुषमा के दफ्तर से उन्होंने दो बार मिलने का वक्त मांगा, पर सुषमा के दफ्तर से उन्हें दो टूक बता दिया गया कि ‘इस दफे मैडम दिवाली नहीं मना रही है, क्योंकि चंद महीने पूर्व ही उनके भाई का देहांत हुआ है।’

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भंवरी क्यों हुई गायब?

Posted on 06 November 2011 by admin

सीबीआई को अब तलक भंवरी देवी का कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है, पर सूत्र बताते हैं कि भंवरी देवी पिछले 5 सालों से निरंतर मदेरणा के संपर्क में थीं, जिनसे उनकी अंतरंगता बढ़ी। मदेरणा ने भंवरी को आश्वासन दे रखा था कि वे भंवरी को विधायक व मंत्री बनवाएंगे, सो भंवरी की राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाएं उफान पर थीं, पर जब मदेरणा उसके लिए कुछ नहीं कर पाए तो कथित तौर पर एक विंडो एसी में कैमरा छुपा कर भंवरी ने मदेरणा के साथ अपनी एक सीडी बनवा ली, कहा जाता है कि इस सीडी को लेकर वह राजस्थान भाजपा की सबसे बड़ी नेत्री के पास पहुंची और उनसे कहा कि अगर वे दो करोड़ दें तो गहलोत की सरकार गिर सकती है, भाजपा की मैडम ने सीडी देखी और कहा कि मदेरणा कोई इतना बड़ा प्लेयर नहीं कि उन पर आरोप साबित होने पर सरकार गिर जाए। मामला सामने आने पर उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। जब इस सीडी का पता मदेरणा को चला तो उन्होंने भंवरी से यह सीडी मांगी, कहा जाता है कि मदेरणा के प्रति भंवरी का रवैया रोषपूर्ण था, चुनांचे उसने कहा कि औरों के लिए 2 करोड़ पर तुम्हारे लिए सीडी की कीमत है 5 करोड़। लेकिन इसके बाद से ही भंवरी गायब हो गई और आज तक लापता है।

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त्रिवेदी की पटरी छोड़ती रेल

Posted on 06 November 2011 by admin

केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के रिश्तों में खटास लगातार बढ़ती जा रही है, त्रिवेदी का कॉरपोरेट आचार-व्यवहार दरअसल ममता को रास नहीं आ रहा है और पिछले दिनों जिस तरह से रेल वैगन के 26 हजार करोड़ का काम बगैर टेंडर सिर्फ नॉमिनेशन के आधार पर पब्लिक सेक्टर कंपनी भेल को दिया गया उस पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि सूत्र बताते हैं कि भेल ने काम को सबकांट्रेक्ट पर एक प्राइवेट कंपनी टीटागढ़ वैगन को दे दिया है। इस प्राइवेट कंपनी के मालिकों की कथित तौर पर प्रफुल्ल पटेल और दिनेश त्रिवेदी से काफी नजदीकियां हैं। इस पूरी डील को सरंजाम देने में सैम पित्रोदा की भी एक महती भूमिका रही है जिसे त्रिवेदी ने रेलवे की आधुनिकीकरण कमेटी का प्रमुख बनाया हुआ है।

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ईवीएम पर सवाल

Posted on 06 November 2011 by admin

नासा और डिपार्टमेंट एनर्जी, अमरीका कि एक हालिया रिपोर्ट के बाद कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) ‘हैक्ड’ किया जा सकती है, भाजपा ईवीएम के मुद्दे को ढोल-नगाड़े के साथ दुबारा उठा सकती है, अडवानी की जन चेतना यात्रा भले ही फ्लॉप रही हो पर उनके कई सवाल व आइडियाज हिट रहे हैं, और अडवानी कालांतर में लगातार ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर पहले भी सवाल उठा चुके हैं, क्याेंकि भाजपा चिदंबरम की जीत को अभी भी संदेह की निगाहों से देखती है। चूंकि चिदंबरम का हारते-हारते जीत का मामला पहले से ही कोर्ट में लंबित है सो, पार्टी को ईवीएम मशीनों की ‘रिकाऊंटिंग’ की क्षमता को लेकर भी शक है, भाजपा के नेता पहले से ही दबी जुबान में कहते आए हैं कि 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 206 सीटें दिलाने में ईवीएम मशीनों की भी एक महती भूमिका रही है, कई छोटे-बड़े दल पहले से ही ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। चुनांचे आने वाले दिनों में ईवीएम मशीनों पर सियासत गरमा सकती है।

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गांधी हुए टेक्नो सेवी

Posted on 06 November 2011 by admin

दो गांधी भाईयों राहुल और वरुण में कौन सी बात सबसे कॉमन है? दोनों ही बड़े टेक्नो सेवी हैं। राहुल अपने ब्लैक बेरी फोन के दीवाने हैं तो उनके छोटे भाई को टि्वटर के बगैर चैन नहीं। पार्टी की अहम बैठकों में भी राहुल अपने ब्लैक बेरी मैसेंजर पर अक्सरां बिजी नजर आते हैं, तो वरुण कई ज्वलंत मुद्दों को उठाने में सोशल नेटवर्किंग साइट ‘टि्वटर’ का बतौर हथियार बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। एफ-1 रेस में टैक्स चोरी का मामला हो, केजी बेसिन का या स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन का वरुण के टि्वट न सिर्फ खासा चर्चा बटोर रहे हैं, पार्टी में दिग्गज नेताओं की पेशानियों पर बल भी ला रहे हैं। पर वरुण को मना करने की जुर्रत करे कौन?

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अरुणाचल में छल

Posted on 06 November 2011 by admin

समझा जाता है कि अरुणाचल में नेतृत्व परिवर्तन का अकस्मात निर्णय दस जनपथ का अपना था। नार्थईस्ट में अरुणाचल प्रदेश और असम दो राज्य ऐसे हैं जहां ईसाईयों के अलावा अन्य धर्मावलंबियों की संख्या भी कहीं ज्यादा है। अरुणाचल व असम में तो संघ भी काफी सक्रिय है और संघ की काट के तौर पर इन दोनों राज्यों में ईसाई मिशनरियां भी खासी एक्टिव है। अरुणाचल चीन की सीमा से लगा है और यहां बौध्द धर्मावलंबियों की संख्या कहीं ज्यादा है। अरुणाचल के दो जिलों तिरप और चांगलांग में नगा गुट काफी सक्रिय हैं, जिन पर अक्सरां ये आरोप लगता है, कि ये गुट लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करता है, यानी यह गुट सीधे तौर ईसाई मिशनरियों को फायदा पहुंचाता है,अरुणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री जारबोम गामलिन ने नगा गुट पर काफी सख्ती बढ़ा दी थी, सो ईसाई मिशनरियां इस बात से उनसे काफी नाराज थीं, सो नायिशी कम्यूनिटी के नबम टुकी को सोनिया के निर्देश पर राज्य की कमान सौंप दी गई, सनद रहे कि टुकी का ईसाई धर्म में अटूट विश्वास है और उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए राज्य के गिरिजा घरों में खूब प्रार्थनाएं भी हुई थीं, प्रार्थना प्रभु तक जरूर पहुंची होगी तभी तो मैडम ने सुन लिया।

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