Posted on 26 September 2011 by admin
ना मालूम उनके ख्याल की जात क्या है? ना मालूम उनके खटराग की ठाठ क्या है? हुक्मरानों का जमाना है सिर झुकाकर हर इलजाम कुबूल कर, 32 में कहें या 26 में उतने में अपना पेट भर, मत कर सवाल ख्वामख्वाह कि क्यों नहीं इनका पेट भरता है तब भी जब ये डकार जाते हैं 1 लाख करोड़ या उससे भी कहीं ज्यादा? सो चिदंबरम को फिलवक्त बचाया जाएगा, न्यूयॉर्क से प्रधानमंत्री, और दिल्ली से राजमाता यही चाहती हैं, तब भी उनका बाल कहां बांका हुआ था जब पीसी के जन्मदिन 16 सितंबर पर तमाम चैन्नई में एक पोस्टर लगाया गया जिसमें चिदंबरम को कृष्ण के रूप में दर्शाया गया था (गंजा कृष्ण ही सही!) और उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री भी बताया गया था। बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी, जब विपक्षी हमले शांत हो जाएंगे, चिदंबरम पर आरोपों की झड़ी बंद हो जाएगी तो एक दिन आहिस्ते से उन्हें चलता कर दिया जा सकता है, कभी न लौट आने के लिए।
Posted on 18 September 2011 by admin
भाजपा को जहां हरियाणा में कुलदीप विश्नोई के तौर पर एक नया सियासी साथी मिला है, पंजाब में उसके पुराने मित्र अकाली रंग बदल रहे हैं, दरअसल प्रकाश सिंह बादल पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इस दफे के विधानसभा चुनाव में अकालियों का गठबंधन बसपा के साथ हो जाए। अकाली आसन्न चुनावों में भाजपा की होने वाली दुर्दशा को भांप चुके हैं इसीलिए अपने लिए वे नए गठबंधन साथी की तलाश में हैं।
Posted on 18 September 2011 by admin
अन्ना की गाज मनमोहन के सबसे प्यारे चंडीगढ़ क्लब पर गिर सकती है, कपिल सिब्बल, पवन बंसल व अश्विनी कुमार पीएम के चंडीगढ़ क्लब के अहम मेंबर माने जाते हैं। पूर्व खेल मंत्री एम.एस.गिल भी इसी कोटे से आते थे, पर बाद में पीएम को मजबूरी में उनकी छुट्टी करनी पड़ी। अश्विनी कुमार के बारे में तो उनके विरोधी यहां तक प्रचारित करते हैं कि उन्हें मंत्री बनवाने में उनके मित्र व होटेलियर संत सिंह चटवाल की एक महती भूमिका रही है।
Posted on 18 September 2011 by admin
विकीलिक्स के खुलासे को चाहे मायावती ‘बड़ा-झूठा’ बता गई हो, पर उसके बाद से ही उनके अफसरों व वैसे नेताओं के इर्द-गिर्द खुफिया तंत्र गहरा गया है, जिनकी मायावती दरबार में आसानी से आवाजाही है। बहिनजी को शक है उनके बीच का ही कोई है जो अंदर की बात को बाहर लीक कर रहा है। नहीं तो उनकी सेंडिल व ‘फूड टेस्टर’ की कहानी इतनी भी मनगढंत नहीं।
Posted on 18 September 2011 by admin
कर्नाटक, उत्तराखंड के बाद क्या हिमाचल का नंबर लगने वाला है? भाजपा तेजी से खुद के ‘इमेज मेक ओवर’ अभियान में जुटी है और अपने दागी छवि वाले मुख्यमंत्रियों को बदलने में एक पल की भी देर नहीं लगा रही है, ऐसे में हिमाचल से धूमल और उनके सांसद पुत्र के कारनामें व कारगुजारियां किसी से छुपी नहीं रह गई है। शांता कुमार के नेतृत्व में धूमल विरोधियों का एक गुट हालिया दिनों में जब गडकरी से मिला तो गडकरी को उनमें विरोध की आग कम दिखी। इसीलिए उन्होंने असंतुष्ट खेमे को बस इतना ही आश्वासन दिया कि मुख्यमंत्री तो नहीं पर प्रदेश अध्यक्ष आप लोगों की च्वॉइस का बना दिया जाएगा। पर सुनते हैं कि उत्तराखंड परिवर्तन से प्रेरित होकर शांता कुमार थोड़े कड़े तेवर अख्तियार करने की सोच रहे हैं।
Posted on 18 September 2011 by admin
कांग्रेसी हलकों में अब यह सवाल एक ‘यक्ष प्रश्न’ बनकर मंडरा रहा है कि और पार्टी की कितनी फजीहत करवाएंगे संदीप दीक्षित। अन्ना मुद्दे पर संसद में बोलते हुए वे राहुल गांधी और उनकी एक दिन पूर्व दी गई स्पीच का जिक्र करना भूल गए। कई मायनों में उन्हें दिल्ली का ‘डिफेक्टो सीएम’ भी कहा जाता है, क्योंकि वे कथित तौर पर न सिर्फ दिल्ली सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का ट्रैक रखते हैं अपितु इन योजनाओं से जुड़े अनुदान एनजीओ को देने-दिलवाने में भी उनकी एक महती भूमिका होती है। किरण बेदी व अरविंद केजरीवाल के संपर्क में भी वे कुछ इन्हीं वजहों से आए। कहा तो यह भी जाता है कि सोनिया-विरोध का अलख जगाने वाले कई भाजपा नेताओं से भी उनकी गहरी छनती है। ताजा मामला भोपाल एक्सप्रेस में गलती से रह गया नोटों भरा सूटकेस का है, दीक्षित दावा करते हैं कि भले ही यह बैग उनके एसी फर्स्ट क्लास कूपे में था, पर था यह उनके एक मित्र माथुर का। सवाल उठता है कि अगर माथुर वाकई दीक्षित के इतने जिगरी यार हैं तो वे उसी टे्रन के सेकंड एसी में बतौर उनके अटेंडेंट क्यों सफर कर रहे थे? क्या इन रुपयों पर कॉमनवेल्थ गेम्स की छाया मंडरा रही थी? वैसे भी भोपाल से दीक्षित का नजदीकी रिश्ता है, वहां उनकी एनजीओ काम करती है, और माना जाता है कि भोपाल व उसके आस-पास उन्होंने पिछले वर्ष प्रोपर्टी में खासा निवेश भी किया हुआ है। सो एक ऐसे देश में जहां करोड़ों लोग एक जून की रोटी को मुहताज रह जाते हैं, ऐसे में किसी जन प्रतिनिधि या उनके नजदीकी मित्रों का रुपयों भरा बैग ट्रेन में ही छूट जाए तो इससे उनकी रफ्तार को क्या फर्क पड़ता है?
Posted on 18 September 2011 by admin
सोनिया गांधी जब से न्यूयॉर्क से अपना इलाज करवा कर दिल्ली लौटी हैं, वरिष्ठ कांग्रेसी गण उन्हें हर मुमकिन ‘फील गुड फैक्टर’ का अहसास कराने में जुटे हैं। सबसे पहले तो गुलाम नबी आजाद ने उन्हें यह ब्रीफ किया कि उनकी अनुपस्थिति में भारत में क्या-क्या महत्त्वपूर्ण घटा। अन्ना से लेकर अफजल गुरु तक, संसद में राहुल के भाषण से लेकर वरुण तक, मैडम को हर मसले की जानकारी दी गई, पर सतर्क रहते। कांग्रेसी मंत्रियों, सोनिया करीबियों व आईसीसी के पदाधिकारियों ने हर मुमकिन यह कोशिश की मैडम को जो खबर दी जाए उसमें ‘फील गुड फैक्टर’ का छौंक अवश्य हो।
Posted on 18 September 2011 by admin
यूएस कांग्रेस की जिस रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी का इतना स्तुति गान हुआ है उसकी पटकथा तो कहीं पहले से लिखी जा रही थी, बराक ओबामा के दरबार में जितने भी गुजराती पॉवरफुल हैं सभी नरेंद्र मोदी के अनन्य प्रशंसकों में से हैं। ओबामा की सलाहकार समिति की मेंबर व अर्थशास्त्री सोनल शाह के परिवार की जड़ें तो कहीं गहरे रूप से संघ परिवार से जुड़ी हैं, ओबामा टीम के एक और अहम सदस्य 31 वर्षीय पराग मेहता या फिर वहां की डायरेक्टर ऑफ पॉलिसी गुजरात मूल की कविता पटेल हो, सभी ने एक स्वर में ओबामा को समझाना जारी रखा कि मोदी वैसे नहीं जैसी मीडिया ने उनकी छवि दर्शायी है, इतना ही नहीं मोदी ने अभी हाल में ही अमरीका राष्ट्रपति को स्वयं द्वारा संपादित एक पुस्तक ‘कंवीनियेंट एक्शन, गुजरात इन्हेशिएटिव’ भी भेजी थी, ऐसे में तो ओबामा और अमरीकी प्रशासन का यूं पिघलना लाजिमी ही था।
Posted on 18 September 2011 by admin
नरेंद्र मोदी के हालिया अभ्युदय को स्वीकार करने में भले ही पार्टी के वयोवृध्द नेता लालकृष्ण अडवानी ने एक पल की भी देर नहीं लगाई हो, पर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए इसे खतरे की घंटी माना जा सकता है। पहली दफा है जब संघ ने भी मोदी से अपना पुराना वैमनस्य भुलाकर उन्हें मुक्तकंठ से स्वीकार करने की उदारता दिखाई है। वैसे अडवानी की बहुत पहले से यह मंशा रही थी कि वे गडकरी को उनका दूसरा टर्म नहीं लेने देना चाहते हैं। सो, जैसे ही संघ के अंदर से यह संकेत आने लगे कि मोदी पार्टी के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं, अडवानी कैंप ने जोर-शोर से इसे मीडिया में प्रचारित करना शुरू कर दिया है, मोदी ने भी अब अपने उदारता के दर्शन दिखाने शुरू कर दिए हैं, इतने वर्षों में शायद उन्हाेंने पहली बार अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से पूछा कि उत्तर प्रदेश चुनाव के मद में पार्टी को कितना पैसा चाहिए होगा, मोदी दिल व खजाना दोनों ही लुटाने को तैयार बैठे हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर यूपी में भाजपा का प्रदर्शन खस्ता-हाल रहा तो कांग्रेस उन्हें इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं।
Posted on 18 September 2011 by admin
‘बुङ्ढों का अड्डा’ कहे जाने वाले योजना आयोग का चेहरा-मोहरा बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है, जो कहीं न कहीं इस बात का संकेत है कि आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में ही लड़ेगी। क्योंकि योजना आयोग अपने 12वें प्लॉन (2012-17) की तैयारियों में युवा भावनाओं व आकांक्षाओं, कोर् मूत्त रूप देना चाहता है जिसके लिए बकायदा योजना भवन में 20 से 30 वर्ष के नौजवानों की बड़े पैमाने पर कंसलटेंट के तौर पर भर्ती हुई है। इस योजना को न सिर्फ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह की हामी है बल्कि योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार इस मामले में काफी उदारता व सक्रियता बरतते देखे जा सकते हैं, यहां तक कि योजना भवन के पार्किंग लॉट में एक खास जगह आरक्षित है जहां बोर्ड लगा है ‘केवल यंग प्रोफेशनल्स के लिए।’