Archive | May, 2011

…और अंत में

Posted on 15 May 2011 by admin

कई बड़े नामचीन स्वधन्यमान पत्रकार भी अब ममता से राज्यसभा की आस जोहे बैठे हैं, मसलन अवीक सरकार, एम.जे.अकबर, प्रभु चावला आदि-आदि।

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बंगाल में कांग्रेस का असमंजस

Posted on 15 May 2011 by admin

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस बात को लेकर स्पष्टत: दो खेमों में बंटा नजर आता है कि कांग्रेस को ममतानीत तृणमूल सरकार को ज्वॉइन करना चाहिए या फिर उसे बाहर से समर्थन देना चाहिए। मानस भुईंया समेत बंगाल की पूरी प्रदेश कांग्रेस कमेटी, राहुल व सोनिया गांधी ममता सरकार को ज्वॉइन करने के पक्षधर नहीं, वहीं प्रणब मुखर्जी की राय इससे दीगर है, प्रणब दा का मानना है कि अगर कांग्रेस बंगाल में ममता सरकार में शामिल नहीं होती है तो केंद्र की यूपीए-नीत गठबंधन सरकार की सेहत के लिए यह कदम किंचित अच्छा नहीं रहेगा।

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राम भज जेठमलानी

Posted on 15 May 2011 by admin

राम जेठमलानी के पास केसों की नहीं दुआओं की कमी जरूर रही है, वैसे भी अपने राजनैतिक पुनरूत्थान के लिए इन दिनों वे कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं और उन्होंने अडवानी के कोर-ग्रुप के साथ-साथ उनके दिल में भी अपने लिए एक खास जगह बना ली है। इन दिनों जेठमलानी के घर खूब पूजा-पाठ चल रही है जो उनकी दीर्घायू होने की कामना को लेकर है।

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मुश्किल है अमर की डगर

Posted on 15 May 2011 by admin

अमर सिंह के लिए कांग्रेस की संभावनाओं के द्वार पर अब भी अनिश्चय का ताला जुड़ा हुआ है, सूत्र बताते हैं कि वे पिछले 3-4 महीनों से राहुल गांधी से मिलने का समय मांग रहे थे, पर उन्हें समय नहीं मिला। सो, जब उन्हें पता चला कि भट्टा पसरौल गांव में किसानों की मांगों के समर्थन में राहुल धरने पर बैठे हैं तो अमर ने सीधे ग्रेटर नोएडा की ओर रुख कर लिया। पर उन्हें वहां राहुल के बजाए दिग्विजय, हाशमी, राज बब्बर व रीता बहुगुणा जोशी ही मिल पाए, अमर उनके साथ ही दो घंटे तक वहीं जमे रहे, पर राहुल से गुफ्तगु मुमकिन नहीं हो पाई, जैसा कि एक कांग्रेसी नेता कहते हैं कि-‘वे (अमर) अब हमारे लिए महज पेपर नेपकिन रह गए हैं, पर उनकी हसरत रूमाल बनने की थी, जब से अमर ने अपने लरजते जिगर को अपनी आंखों के साथ चस्पां कर लिया है।’

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बात दूर तलक जाएगी

Posted on 15 May 2011 by admin

पर कांग्रेस व इसके सिपहसालार राहुल गांधी के मुद्दे को इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाले, जल्द ही कांग्रेस की मंशाओं को परवान चढ़ाने के लिए इस बारे में कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं दाखिल होने वाली है, इस मामले में अदालत में पहले से ही मुकदमे चल रहे हैं सो बहुत संभव है कि कोई जनहित याचिका भी पहले से चल रहे इन मुकदमों के साथ नत्थी हो जाए।

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कौन कहता है राजीव नहीं हैं, वे हैं और यहीं कहीं हैं

Posted on 15 May 2011 by admin

-अशोक दुबे, स्वर्गीय राजीव गांधी के अनन्य
त्रिदीब रमण नई दिल्ली 20 मई 2011
राजीव की कैबिनेट में प्रणब मुखर्जी को कभी क्यों नहीं मिली जगह, एक बड़ा खुलासा
भले ही अशोक दुबे स्वर्गीय राजीव गांधी के कोई नाते-रिश्ेतदार नहीं, पर राजीव ने उन्हें अपने किसी परिजन से कभी कम नहीं समझा। जब तक राजीव रहे, दुबे साए की तरह उनके साथ रहे, आज राजीव नहीं हैं पर दुबे जी के लिए वे आज भी यहीं हैं, उनकी हर सांस में जिंदा हैं। ‘पंजाब केसरी’ से एक खास बातचीत में वे अपने भाई साहब (राजीव) को याद करते हुए भावनाओं के अतिरेक में बह जाते हैं, तो कभी यकबयक पूरे तरन्नुम में गाने लगते हैं जो खास तौर पर उन्होंने राजीव की यादों को समर्पित किया है-
‘…आज तुम हो, तुम्हारी खुशबू है
तेरी आवाज हर पल मेरे कानों में गुनगुनाती है
ऐ खुदा! यही मेरी जन्नत है, जिस्म से तुम नहीं करीब मेरे
फिर भी हर सांस में मेरे साथ हुआ करते हो…’
दुबे की पत्नी नहीं रहीं, उनकी दोनों बेटियां उन्हें हमेशा के लिए छोड़ स्विट्जरलैंड जा बसी हैं, कुल जमा छह कुत्ते, व दो बिल्लियों के सहारे दिल्ली के महरौली इलाके में एक बड़े से निर्जन घर में वे अपना बुढ़ापा काटने को अभिशप्त हैं, पर जब जिक्र राजीव का आ जाए तो अनायास ही उनकी आवाज का रौब बढ़ जाता है और आंखों में कुछ अलग सा चमकने लगता है…

कलकत्ता (अब कोलकाता) से कोई सौ-सवा सौ किलोमीटर दूर, सुबह कोई साढ़े नौ बजे का वक्त रहा होगा, तारीख अब भी मुझे ठीक से याद है 31 अक्तूबर 1984,मैं राजीव जी के ठीक पीछे खड़ा था,साथ में रवि (राजीव का अंगरक्षक) भी था कि अचानक मंच के नीचे भगदड़ शुरू हो गई, धक्का-मुक्की, शोर-शराबा,जनसभा का मूड बिगड़ जाने का अंदेशा पैदा होने लगा था। राजीव उस वक्त तक राजनीति में नए थे, पर अनाड़ी नहीं थे, वे समझ गए थे कि यह प्रणब मुखर्जी और प्रियरंजन दास मुंशी (तब मुंशी को गनी खां चौधरी का भी समर्थन प्राप्त था) के समर्थकों के बीच का लफड़ा है,आम तौर पर वे इतनी जल्दी आपा नहीं खोते थे, पर उस दिन गुस्से से उनका चेहरा लाल हो गया और वे झटपट मंच की सीढ़ियां उतर कर नीचे आए और उन्हाेंने गुत्थम-गुत्था हो रहे कांग्रेसी कार्र्यकत्ताओं को लगभग धकेल ही दिया, चीख कर बोले-‘क्या कर रहे हो तुम लोग? क्या यही कांग्रेस की परंपरा है?’ वहां मौजूद एक फोटोग्राफर ने झट उस क्षण की तस्वीर उतार ली, मैंने लपक कर उसका कैमरा छीन लिया और उसमें से रील बाहर निकाल ली, मुझे पता था यह तस्वीर वह बयां करेगी, जो सच से आगे की बात है। राजीव जब वापिस स्टेज पर आए तब भी उनके चेहरे पर तनाव था, पर वे सहज होने का यत्न कर रहे थे। उन्होंने माइक लिया और बोलना शुरू किया, अभी बमुश्किल ढाई-तीन मिनट ही बोले होंगे कि रवि ने आगे बढ़कर उनकी कानों में कुछ फुसफुसाया, रवि ने मेरी कमर पर हाथ लगाया बोला-‘अभी निकल लो।’ तब तक राजीव भी बोलना बंद कर चुके थे, वे मंच से नीचे उतर रहे थे, पीछे-पीछे मैं भी बदहवास सा उतर रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार हुआ क्या? तब तक रवि ने मुझे बेहद संक्षिप्त तरीके से बताया कि ‘मैडम को गोली लग गई है।’ मैं अवाक रह गया। मैंने देखा राजीव जी मंच से उतर कर पैदल ही तेज कदमों से एक खाली मैदान की ओर चले जा रहे हैं, उनके हाथ में एक ट्रांजिस्टर था, मैं भागकर उनके पीछे गया वे बीबीसी पर न्यूज सुन रहे थे। तब तक एक बड़ा सा हेलिकॉप्टर भी वहां आ पहुंचा। जिसमें राजीव जी, प्रणब मुखर्जी, के.वी.पन्निकर, मैं, रवि तथा डिफेंस के कुछ लोग बैठे, हेलिकॉप्टर ने कलकत्ता एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी। मैंने राजीव जी की ओर ध्यान से देखा जैसे वह अपने मनोभावों को संयत करने का प्रयास कर रहे थे, उन्होंने अपने हैंड बैग से एक खूबसूरत-सा नेपकिन का डिब्बा निकाला, गीला, खुशबूदार नेपकिन, मुझे, प्रणब सबको उन्होंने एक-एक नेपकिन दिए, फिर अपना चेहरा पोंछा। फिर अपने उसी बैग से उन्होंने एक सेब निकाला, उसे करीने से काटा और एक-एक टुकड़ा सेब का हम सबको दिया। थोड़ी देर बाद हम कलकत्ता में उतरे तो वहां पहले से ही एक बड़ा यात्री जहाज खड़ा था। जहाज में बलराम जाखड़, बंगाल के तत्कालीन गवर्नर और हम सब सवार हो गए। राजीव जी अक्सर उड़ानों में कॉकपिट में ही बैठ जाया करते थे, पर उस रोज वे कॉकपिट का दरवाजा पकड़ कर खड़े थे, एक अजीब सी स्थितप्रज्ञता लिए। तभी पीछे से एक तेज रौबदार आवाज गूंजी-‘राजीव, लिसेन…’ राजीव जी ने घूमकर आवाज की दिशा की ओर देखा, उस वक्त उनकी आंखें सुर्ख लाल थीं, चेहरा बेतरह खिंचा हुआ। मैंने गर्दन पीछे घुमाई तो पाया कि प्रणब थे, पाइप पी रहे थे। मैंने पन्निकर से कहा-‘आज तो बंगाली काम से गया।’ इतिहास गवाह है कि राजीव जी की कैबिनेट में कभी प्रणब मुखर्जी को जगह नहीं मिली। दिल्ली में जहाज जैसे ही टेक्किनल एरिया में पहुंचा मैंने देखा सबसे आगे अमिताभ बच्चन खड़े हैं अरुण सिंह के साथ, राजीव के उतरते ही अमिताभ ने उन्हें गले लगा लिया, दोनों कुछ देर तक वैसे ही रहे, उनकी आंखें गमगीन थीं, हम भी अपना रोना नहीं रोक पा रहे थे। वे अमिताभ के साथ गाड़ी में बैठकर सीधे एम्स की ओर चले गए। हम अरुण सिंह की गाड़ी में थे, जैसे ही हम आइएनए के पास पहुंचे हर तरह धुएं का गुबार उठता दिखा, टायर जल रहे थे, माहौल में अजीब सी बेचैनी थी। एम्स से वापिस लौटते हुए ड्राइवर ने रेडियो लगा दिया था, खबर आ रही थी कि राजीव गांधी ने अभी-अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। मेरी आंखें गीली थी, मैं खिड़की से बाहर की ओर देखने लग गया। मुझे आज भी यह बात समझ में नहीं आ रही कि शीला दीक्षित ने राजीव जी की मौत के 20 साल बाद आज ऐसा बयान क्यों दिया कि जब इंदिरा जी को गोली लगी तो वह राजीव जी के साथ एक ही विमान पर सवार होकर दिल्ली के लिए उड़ी थीं और रास्ते में उन्हें पायलट ने सूचना दी कि इंदिरा जी को गोली लग गई है और वह हमारे बीच नहीं रही हैं। जबकि हकीकत यह है कि शीला जी तो उस विमान में थी ही नहीं, तो वह ऐसा क्यों कह रही हैं? क्या मालूम सियासत की लत ज्यादा लग गई हो।

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खराशें में कुरैशी

Posted on 15 May 2011 by admin

मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी शुक्रवार की शाम क्या कर रहे थे? जब तक कि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी सामने आ चुके थे। कुरैशी इस बात को लेकर खासे संतुष्ट थे कि उन्होंने बंगाल जैसे राज्य में भी बिहार पैटर्न पर शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न करा लिए। सो, शुक्रवार को नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित कामायनी ऑडिटॉरियम में उन्हें गुलजार द्वारा रचित और सलीम आरिफ द्वारा दिग्दर्शित ‘खराशें’ के मंचन में लुत्फ उठाते पाया गया। उस शो में गुलजार भी मौजूद थे और वे कुरैशी के बगलगीर भी थे।

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उमा को ‘ना’

Posted on 15 May 2011 by admin

संघ व नितीन गडकरी के तमाम प्रयासों के बावजूद उमा भारती की भाजपा में पुनर्वापसी टल गई लगती है, अभी पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा की कोर-ग्रुप की बैठक में गडकरी यह मुद्दा पार्टी-फोरम पर लेकर आए थे पर पार्टी की दूसरी पांत के नेताओं ने अध्यक्ष जी के इस निर्णय के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया, सबसे पहले अनंत कुमार बोले-‘उमा का यूपी में क्या काम?’ फिर जेतली व वेंकैया बोले, अंत में सुषमा ने भी अपने मंतव्य जाहिर किए कि उमा की वापसी को लेकर शिवराज सिंह चौहान के मन में कुछ डर व शंकाएं हैं, पहले उसका निराकरण होना चाहिए। वैसे उमा इन दिनों गंगा-सफाई की योजना से जुड़ी हैं, उतनी ही जरूरी भाजपा वालों के मन व दिल की सफाई भी है।

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पीएम की प्रायोजित मंशाएं

Posted on 15 May 2011 by admin

काबुल के राष्ट्रपति भवन में अफगानिस्तान के मुखिया करजई के साथ भारतीय प्रधानमंत्री की संयुक्त प्रेस-कांफ्रेंस में एक अजीब-सा ही नजारा उपस्थित हो गया। मनमोहन के साथ गए पत्रकारों को (खासकर हिंदी पत्रकारों को) तब एक असहज स्थितियों से गुजरना पड़ा जब उन्हें अपने ही पीएम से सवाल पूछने की मनाही हो गई। मनमोहन से कौन भारतीय पत्रकार सवाल पूछे सब प्रायोजित था, सवाल भी और पूछने वाले भी। पीएम के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने अतिशय चतुराई से इसे मैनेज किया हुआ था, भारतीय न्यूज चैनलों में से भी दो अंग्रेजी चैनलों के पत्रकारों के नाम स्वयं पीएम ने पुकारे, जाहिर है ऐसे में कई सवाल अनुत्तरित रह गए, निकट भविष्य में पीएमओ को इसके जवाब देने पड़ सकते हैं।

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बदलेगी केंद्र की राजनीति

Posted on 15 May 2011 by admin

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के साथ केंद्र की राजनीति में नए गठबंधन और नई संभावनाओं के बीज अंकुरित होने लगे हैं। कनिमोझी की संभावित गिरफ्तारी की आहटों के बीच दिल्ली के सियासी गर्दो गुबार में एक अपुष्ट खबर ने जब चरमरा कर अंगड़ाई ली कि करुणा पुत्र अझागिरी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना त्याग पत्र दे दिया है तो तब से यह कयास लगने लगे हैं कि डीएमके कोटे के मंत्रिगण कभी भी मनमोहन सरकार को अलविदा कह सकते हैं, काले चश्मे वाला बाबा इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि क्या अब डीएमके को यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देना चाहिए? यही एक यक्ष प्रश्न है जो कांग्रेसी मैनेजरों की पेशानियों पर बल ला रहा है।

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