वही हुआ जो हमने कहा

December 23 2009


आपसे गुजारिश है कि आप इसे हमारी आत्म-मुग्धता हर्गिज ना मानिए, पर क्या यह सच नहीं कि कोई दो सप्ताह पूर्व ही ‘मिर्च मसाला’ कॉलम में सर्वप्रथम यह सत्य उद्धाटित हुआ था कि ’19 दिसंबर को गडकरी का लगेगा नंबर’ सत्य की बानगी पर शब्दों का यह कथ्य कितना सटीक साबित हुआ यह कोई कहने की जरूरत नहीं। पिछले सप्ताह इसी कॉलम में सर्वप्रथम यह प्रकाशित हुआ कि भाजपा के पार्टी संविधान में संशोधन करके अडवानी को पार्टी संसदीय दल का चेयरमैन बनाया जाएगा और सुषमा स्वराज को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनेंगी, समय-काल गवाह है कि इस शुक्रवार को ऐसा ही कुछ घटित हुआ। पर सवाल सबसे अहम है कि आखिरकार भाजपा में बड़े निर्णय लेता कौन है? भाजपा संसदीय दल के नेताओं को कानों-कान खबर नहीं हुई, पार्टी महासचिवों से भी नहीं पूछा गया, यहां तक कि कोरग्रुप तक को भरोसे में नहीं लिया गया और पार्टी संविधान में इतना बड़ा संशोधन कि अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष पार्टी संसदीय दल का चेयरमैन नहीं होगा। और तो और इस नवगठित पद वाले व्यक्ति को ही यह समुचित अधिकार प्रदान कर दिया गया कि राज्यसभा व लोकसभा में क्रमश: पार्टी के नेता को यही व्यक्ति नामित करे, वाह रे, आइडिया की यह कौन सी पोटली ढूंढ लाए हैं जेतली! अब तो पार्टी संविधान में संशोधन कर मंडल के सदस्यों को उनके मताधिकार से भी वंचित कर दिया गया, पर कहीं कोई हूक नहीं उठी, किसी वरिष्ठ पार्टी जन को दर्द नहीं हुआ, यहां तक कि पार्टी संसदीय दल की बैठक कब बुलाई जाए पार्टी में इस बात पर भी कोई ‘डिस्कस’ नहीं होता, वाह री पार्टी विद ए डिफरेंस!

 
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