नेता प्रतिपक्ष का पक्ष

February 02 2011


सीवीसी थॉमस की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज का हलफनामा यूपीए सरकार की ‘पोल खोल’ कड़ी का एक अहम अध्याय है। सरकार की ओर से देश के अटार्नी जनरल कोर्ट को बताते हैं कि कमेटी के सदस्यों को थॉमस के खिलाफ केस की जानकारी नहीं थी। जबकि 3 सितंबर 10 को जब नए सीवीसी की नियुक्ति के लिए गठित कमेटी (इस कमेटी में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री व नेता प्रतिपक्ष शामिल रहते हैं) की बैठक बुलाई गई तो पैनल में तीनअधिकारियों के नाम शामिल थे – थामस, पेट्रोकेमिकल सेक्रेटरी चटर्जी, सेक्रेटरी फर्टिलाइजर कृष्णन। बैठक शुरू होते ही सुषमा ने अपनी राय से पीएम व चिदंबरम को अवगत करा दिया कि थॉमस के नाम पर उन्हें आपत्ति है, क्योंकि पॉमोलिन ऑयल कांड में थामस के खिलाफ केस है। इस पर चिदंबरम ने कहा कि थॉमस उस केस से बरी हो चुके हैं, सुषमा ने अपने अंदाज में चुनौती उछाली कि ये मीटिंग 24 घंटे के लिए स्थगित कर मामले की जांच करा ली जाए। इस पर पीएम ने कहा कि यह निर्णय आज ही होना है। ठीक इसके पंद्रह मिनट बाद पृथ्वीराज चव्हाण एक पत्र बनवा लाए जिसमें लिखा था कि ‘बहुमत से सीवीसी के लिए थॉमस का चयन किया जा रहा है पर इससे नेता प्रतिपक्ष सहमत नहीं हैं।’ इस पत्र पर तीनों यानी पीएम, चिदंबरम व सुषमा के हस्ताक्षर होने थे, सुषमा ने उस पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए अपने हाथों से लिखा-’आइ डिसएग्री’(मैं असहमत हूं), पर आजाद भारत में लोकतंत्र की एक नई परिपाटी कायम करने को उतारू सत्तारुढ़ दल के पास ऐसी असहमतियों पर कान धरने के लिए कितना वक्त है, थॉमस प्रकरण इसकी सबसे मौजूं मिसाल है।

 
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