खेवनहार बनाम डूबनहार

September 14 2009


भाजपा की असल चिंता पब्लिक में पार्टी की इमेज को लेकर है। 2004 के पिछले लोकसभा चुनाव में जब पार्टी की हार हुई थी तो तब प्रमोद महाजन थे जिन्होंने इस पराजय की नैतिक जिम्मेदारी दन्न से अपने ऊपर ले ली थी, एक अटल बिहारी वाजपेयी थे जिन्होंने नेता विपक्ष बनना भी गवारा नहीं किया, तब महाजन को वाजपेयी का खेवनहार कहा गया था। भाजपा की 2009 के चुनावों में हार एक अनाथ हार है, जिसका कोई स्वीकारर्-कत्ता नहीं। अडवानी के डूबनहार ने भी हार के महज दो दिन बाद एक अंग्रेजी दैनिक में एक लेख लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली कि ‘हम क्यों हारे?Ó उन्होंने इसे मध्यमार्गियों की जीत बताया। यानी इशारा साफ था कि संघ के मोहपाश से निकले बगैर पार्टी का भला नहीं होने वाला। उनकी इसी धारा को उनके अन्य मित्रों स्वप्नदास गुप्ता और सुधींद्र कुलकर्णी ने भी अपने लेखों में आगे बढ़ाया। यानी संघ पर हमला साफ था, ना नीयत दोयम थी, न विचार।

 
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