क्या यूपी बदल रहा है?

June 02 2024


भाजपा के लिए इस दफे यूपी का चुनावी मैदान किंचित इतना आसान नहीं रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने यहां की 80 में से 62 सीटें जीत ली थीं और इस दफे भाजपा न सिर्फ अपना रिकार्ड बरकरार रखना चाहती थी बल्कि उसे और बेहतर भी बनाना चाहती थी। राजनैतिक पर्यवेक्षक बताते हैं कि इस दफे यूपी की चुनावी फिज़ा किंचित बदली-बदली सी थीं। खास कर युवाओं और ओबीसी वोटरों में भाजपा को लेकर वो पहली सी दीवानगी नहीं देखी गई। इसी एक जून को चुनाव के अंतिम चरण की 57 सीटों में से यूपी की 13 सीटों पर भी मतदान संपन्न हुए। अगर भाजपा के 2019 का आंकड़ा देखें तो इस चरण की महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, बांसगांव, देवरिया, सलेमपुर, बलिया, चंदौली और वाराणसी में भाजपा ने अपना भगवा झंडा लहराया था वहीं मिर्जापुर और राबटर्सगंज की सीटें भाजपा की सहयोगी अपना दल के हिस्से आई थी। यानी भाजपा और उनके सहयोगियों ने इन 13 में से 11 सीटें जीत ली थीं 2 सीटें बसपा के हिस्से आई थीं। पर इस दफे यहां मंजर बदला बदला सा नज़र आ रहा है। साफ तौर पर दिख रहा है कि देवरिया, बलिया और चंदौली जैसी सीटें फंसी हुई हैं और भाजपा ने इन चुनावों में जो ’नेरेटिव’ तैयार किया था यहां की जनता उसे हाथों-हाथ नहीं ले पायी। जनता के लिए फ्री राशन और राम मंदिर यहां कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया बल्कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, महंगी बिजली, महंगा गैस सिलेंडर, पुलिस, सेना, रेलवे और शिक्षकों की भर्ती न होना यहां एक बड़ा मुद्दा रहा है। यूपी के अन्य चरणों के मतदान में भी कानपुर, कन्नौज, धौरहरा, शाहजहांपुर, अमेठी और रायबरेली जैसी सीटों पर जनता द्वारा परिभाशित यही मुद्दे मुखर नज़र आ रहे थे। जो इंडिया गठबंधन के लिए अच्छी ख़बर हो सकती है।

 
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