| मेनका का पशु-प्रेम |
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January 03 2011 |
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उनकी जेठानी जहां सत्ता के शीर्ष कंगूरे पर बैठी दिल्ली की सरकार को अपनी अंगुलियों पर नचा रही हैं, पर हाशिए के लोगों की सुध भी मुश्किल ले पा रही हैं, वहीं इसके उलट विपक्ष की धूनी रमा रही मेनका गांधी को जानवरों की फिक्र भी उतनी शिद्दत से है। पिछले दिनों जब मेनका के संज्ञान में यह आया कि एक प्रमुख दवा की कंपनी रैनबक्सी ने जिन 33 कुत्तों पर विभिन्न मेडिकल परीक्षण किए हैं, उनका हाल बुरा है, तो उन्होंने कंपनी केर् कत्तार्-धत्ताओं से फोन करके कहा कि कंपनी वालों को इन बेजुबान कुत्तों का जो इस्तेमाल करना था वे कर चुके, अब तो ये उनके किसी काम के नहीं रह गए हैं, सो इन कुत्तों को वे मेनका की संस्था को सौंप दें ताकी उनकी ठीक से देख-भाल हो सके, कंपनी वालों ने मेनका से कहा कि इसके लिए वे सरकारी स्वीकृति ले आएं। मेनका ने पर्यावरण मंत्रालय में बात की तो मंत्री जी ने इसके लिए एक कमेटी बना दी। कमेटी वालों ने कंपनी के पास एक परफॉर्मा भेजा कि वे उन कुत्तों के बारे में विभिन्न जानकारियां मुहैया कराएं मसलन उनका रंग, नस्ल, आकार-प्रकार, उसके मां-बाप की जानकारी…आदि-आदि, यानी यह पूरा मामला सरकारी प्रक्रियाओं में उलझता जा रहा था, पशु अधिकार के लिए निरंतर संघर्ष करने वाली मेनका गांधी का भी धैर्य चुकता जा रहा था, तो तंग आकर उन्होंने कमेटी से जुड़े मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव को फोन कर जानना चाहा कि इन कुत्तों के रिलीज ऑर्डर कब तक आ जाएंगे? तो संयुक्त सचिव महोदय का जवाब था कि फिलहाल वे बीमार चल रहे हैं इसीलिए ऑर्डर नहीं दे सकते, वैसे भी कंपनी वालों ने पूरा प्रपत्र भरकर अब तक भेजा नहीं है, प्रपत्र का जिक्र आते ही मेनका के सब्र का बांध टूट गया-‘क्या इन कुत्तों की शादी करवानी है जो पत्री चाहिए कि इतना विवरण मांग रहे हो…।’ हक्का-बक्का रह गए संयुक्त सचिव ने आनन-फानन में रिलीज ऑर्डर पर दस्तख्त कर दिए, बहुत मुमकिन है कि नए साल के पहले सोमवार तक ये कुत्ते मेनका के पशु अस्पताल में पहुंच भी जाएं। |
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