| क्या होगा बाबा का? |
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June 01 2014 |
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सत्ता के गलियारों में अब इस बड़े सवाल ने सिर उठाना शुरू कर दिया है कि क्या बाबा रामदेव का हश्र भी प्रवीण तोगड़िया का होगा? सनद रहे कि सन् 2001 से पहले तक प्रवीण तोगड़िया की गुजरात में तूती बोलती थी, राज्य की भाजपा सरकार के हर अहम फैसले में कहीं न कहीं तोगड़िया की रायशुमारी शामिल रहती थी, पर जैसे ही 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के राजनैतिक फलक पर अभ्युदित हुए उन्होंने शनै: शनै: तोगड़िया के कद को कांट-छांट कर इतना छोटा कर दिया कि वे ‘बोन साई’ लगने लगे। गुजरात में यही हाल कहीं न कहीं संघ व उनके अनुषांगिक संगठनों का भी हुआ। सो, रामदेव ने जब चुनाव प्रचार के दौरान किसी न किसी बात को लेकर मोदी पर दवाब बनाना शुरू किया तो चुनाव संपन्न हो जाने तक मोदी ने चुपचाप इन्हें सहा। पर जब भाजपा को बहुमत मिलने के बाद रामदेव ने अपनी ओर से मंत्रियों की एक लिस्ट मोदी को भिजवाई तो मोदी बिदक गए। बाबा व नमो में तानातनी इस कदर बढ़ी की बाबा मोदी के शपथ ग्रहण में भी नहीं आए और उसमें बालाकृष्ण और अपने कुछ अन्य शिष्यों को शामिल होने के लिए दिल्ली भेज दिया। बाबा के बारे में कहा गया कि अभी वे मौन व्रत में हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब आने वाले कुछ महीनों में बाबा को भी अपने धन का हिसाब-किताब देना पड़े। काले धन मसले पर मोदी ने अपनी पहल पर एसआईटी का गठन पहले ही कर दिया है। अब मोदी के समक्ष यह साबित करने की चुनौती है कि न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर! |
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