क्या मोदी चीनी खाना छोड़ेंगे?

February 15 2015


दिल्ली की हार से बांबे क्लब में एक बड़ा मैसेज चला गया है, यह उन उद्योगपतियों के लिए एक बड़ा झटका था, जो मोदी को अपराजेय मान बैठे थे और उन्हें लगता था कि मोदी की जीत के अष्वमेध घोड़े को रोकने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ है। सियासत में भ्रम टूटता है और धुंध भी छंटती है। सो, अब यही लोग मानने लगे हैं कि मोदी प्रधानमंत्री से ज्यादा विदेष मंत्री बन कर रह गए हैं और घरेलू मोर्चे पर उन्हें मुंह की खानी पड़ रही है। नहीं तो जो मोदी विदेष नीति निर्धारण में स्वयं को नेहरू से बढ़ा-चढ़ा कर प्रोजेक्ट कर रहे थे। वे भूल गए कि जब नरसिम्हा राव भी अमेरिका में ‘हाउस आॅफ रिप्रजेंटेटिव्स’ को संबोधित करने गए थे तो उन्होंने अमरीका व पाकिस्तान के कष्मीर खटराग पर उन्हें आड़े हाथों लिया था और उन्हें मैक्सिको की मिसाल दी थी। तब राव ने गाांधी जी का एक किस्सा भी सुनाया था कि कैसे एक महिला उनके पास अपने बेटे को लेकर आई और उनसे निवेदन किया-‘बापू, यह चीनी बहुत खाता है, इसकी यह लत छुड़वाइए।‘ गांधी ने उस महिला को 15 दिन बाद आने को कहा, 15 दिन बाद जब महिला आई तो गांधी के कहने पर उसके बेटे ने चीनी खानी छोड़ दी। तब महिला ने गांधी से पूछा कि ‘बापू, यह बात तो आप 15 दिन पहले भी कह सकते थे’ तो गांधी का जवाब था कि ‘तब मैं भी चीनी खाता था।’ क्या मोदी जी चीनी खाना छोड़ेंगे?

 
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