क्या पार लगेगी कन्हैया की नैया?

April 29 2019


बेगुसराय का चुनावी मैदान इस दफे बेहद दिलचस्प हो गया है। जेएनयू फेम के कन्हैया कुमार ने यहां के त्रिकोणीय मुकाबले को किंचित रोचक बना दिया है। पहले गिरिराज सिंह यहां कुछ बेदम से दिख रहे थे अब भाजपा ने यहां पूरा दम लगा दिया है। कन्हैया के पक्ष में बुद्धिजीवियों ने एक समां बांध रखा है आंदोलनकर्मी, शिक्षाविद् से लेकर बॉलीवुड के लोग कन्हैया के पक्ष में अलख जगा रहे हैं। कहते हैं केवल ’क्राउड फंडिंग’ से कन्हैया के लोगों ने 70 लाख से ज्यादा की रकम जुटा ली है। विदेशों में रहने वाले लोग भी खुले दिल से पैसा भेज रहे हैं। गिरिराज सिंह को भाजपा की स्थानीय इकाई से ही भीतरघात का भय सता रहा है। यहां के पूर्व भाजपा सांसद जो अब दिवंगत हो गए हैं, भोला सिंह की पुत्रवधु भले ही यहां की बछवाड़ा विधानसभा सीट से चुनाव हार गई हों पर स्थानीय भूमिहारों में तो उनका असर है ही। बेगुसराय सीट को भूमिहार जाति का गढ़ माना जाता है यहां साढ़े चार लाख से ज्यादा इस जाति के वोट हैं। भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह और वामपंथी उम्मीदवार कन्हैया दोनों इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं। लालूनीत गठबंधन ने यहां से तनवीर हसन को मैदान में उतारा है। भाजपा खेमा जोर-शोर से कन्हैया को देशद्रोही साबित करने की मुहिम में जुटा है तो कन्हैया समर्थकों ने जाति का एक नया कार्ड खेल दिया है, सूत्रों की मानें तो अब वे भूमिहार जाति में भी कन्हैया का गौतम गोत्र सामने लेकर आ गए हैं। युवाओं और बहुत हद तक मुस्लिम वोटरों का कन्हैया को पहले से समर्थन हासिल है अगर वे भूमिहार वोटरों में दोफाड़ करवाने में सक्षम रहते हैं तो वे गिरिराज और हसन के समक्ष एक महती चुनौती पेश करने में सफल हो सकते हैं। बिहार में जातिवादी राजनीति का कितना जलवा है इसे एक पुराने किस्से से समझा जा सकता है। यह बात 1991 की है जब लालू यादव की बिहार की राजनीति में तूती बोलती थी तो वे इंद्र कुमार गुजराल को पटना से चुनाव लड़वाने के लिए यहां लेकर आए थे। अब लालू के समर्थकों ने ही पूछना शुरू कर दिया है कि गुजराल की जाति क्या है तो चतुर सुजान लालू ने अपने समर्थकों से कहा कि आप गुजराल को पंजाब का गुर्जर यानी यादव समझ लो, बात फिर बन ही गई।

 
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