कुशवाहा कैसे फंसे नीतीश के जाल में

November 20 2018


उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीति और तौर-तरीकों पर लंबे समय से नीतीश कुमार की नजर थी। नीतीश जानते थे अगर वे सिर्फ कुर्मियों के नेता बनकर रह गए तो बिहार में कुर्मी वोटरों की तादाद महज 2 फीसदी है। अगर उन्होंने कुर्मी, कोइरी और धानुक जाति की लीडरशिप हथिया ली तो बिहार की 10 फीसदी आबादी के नेता बन जाएंगे। सो यकीन मानिए उपेन्द्र कुशवाहा को एनडीए से बाहर का दरवाजा दिखाने में नीतीश की एक महती भूमिका रही। कुशवाहा को लेकर उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से कई दौर की बातचीत की। एक ओर शाह उपेन्द्र कुशवाहा से ये कहते रहे कि वे जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा, भाजपा और नीतीश का साथ दिसंबर तक ही है। दूसरी ओर वे नीतीश के साथ मिलकर सियासी गोटियाँ भी चलते रहे। अगर कुशवाहा ने केंद्र में मंत्रिपद का लालच न किया होता और वे दो-तीन महीने पहले ही भाजपा का साथ छोड़ राजद के पाले में आ गए होते तो लालू उन्हें 5 से 6 सीटें दे सकते थे। अब लालू की मुश्किल यह है कि उन्हें कांग्रेस के लिए भी सीटें छोड़नी है, सीपीआई, जीतन मांझी, शरद यादव, पप्पू यादव जैसों के लिए भी सीटें छोड़नी होंगी। सबसे बड़ा पेंच तो पप्पू यादव ने फंसा रखा है वे सुपौल के साथ मधेपुरा की भी सीट मांग रहे हैं। मधेपुरा के लिए ही शरद यादव का भी दावा है। अगर पेंच फंसा, बात नहीं बनी तो शरद यादव दीपांकर भट्टाचार्य और उपेन्द्र कुशवाहा के साथ मिलकर अपना एक अलग ग्रुप बना सकते हैं। अगर उपेन्द्र कुशवाहा इस गठबंधन के साथ या अकेले भी चुनाव लड़ते हैं तो इससे लालू को नुकसान नहीं होगा बल्कि कुशवाहा भाजपा-जेडीयू के ही वोट काटेंगे। कुशवाहा को जल्द ही अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देना होगा।

 
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