शाह ही असली शहंशाह साबित हुए

June 04 2019


बकौल मुनव्वर राणा-’कभी थकान के असर का पता नहीं चलता, वो साथ हो तो सफर का पता नहीं चलता।’ प्रधानमंत्री चाहें तो अपने मित्र शाह के लिए यह शेर गुनगुना सकते हैं। जिन्होंने 2019 के चुनावी घमासान में न सिर्फ कदम से कदम मिला कर मोदी का साथ दिया, बंपर बहुमत से जब मोदी की वापसी हुई तो नए मंत्रियों के चयन से लेकर उनके विभागों के बंटवारे तक में शाह की एक अहम भूमिका रही। अपने स्वास्थ्यगत कारणों की वजह से अरूण जेटली को नए मंत्रिमंडल में नहीं लिया जा सके। प्रधानमंत्री स्वयं जेटली से मिलने, उन्हें मनाने उनके घर जा पहुंचे, पर बात नहीं बनीं। संघ अमित शाह के लिए सरकार में एक बड़ी भूमिका चाहता था। शाह का दिल वित्त मंत्रालय में उलझा था पर संघ का मानना था कि इस वक्त देश को एक मजबूत और फैसले लेने वाला गृह मंत्री चाहिए। ऐसा गृह मंत्री जो धारा 370, 35ए, कश्मीर, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी और राम जन्मभूमि जैसे मुद्दों को एक निर्णायक मुकाम तक ले जा सके। सूत्रों की मानें तो संघ प्रमुख की ओर से पीएम को यह मैसेज भेजा गया था कि वे शाह को या तो डिप्टी पीएम या फिर देश के गृह मंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं। कहते हैं संघ के समझाने-बुझाने के बाद ही सियासत के धुंरधर राजनाथ सिंह ने गृह मंत्रालय के ऊपर से अपना दावा छोड़ दिया और अपनी राजनैतिक अस्मिता की रक्षा के लिए रक्षा मंत्रालय के प्रस्ताव को लपक लिया।

 
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