बहुत गहरे हैं सुषमा स्वराज के नहीं होने के निहितार्थ

August 17 2019


तारीखों की पेशानियों पर यह सिलवटों सा जो है/ बोसीदा हवाओं में ये रतजगों सा जो है
ज़र्रा-ज़र्रा में महक अब भी तेरे होने से जो है/ यह तेरी रूह की ज़र्रानवाजी है, जो वक्त के मौजों पर है।
इस शुक्रवार को जब नई दिल्ली के 15 जनपथ स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में भारतीय राजनीति में धूमकेतु सा चमकने वाली सुषमा स्वराज की उठावनी आहूत थी तो वहां उनके चाहने वालों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। हॉल में जगह कम पड़ गई, तो हजारों की तादाद में लोगों को हॉल से बाहर लगे स्क्रीन पर अपने प्रिय नेता को अपना अंतिम श्रद्धा सुमन अर्पित करते देखा गया। हालांकि यह परिवार का एक निजी कार्यक्रम था पर उन्हें अंतिम श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए बड़े नेताओं, विदेशी राजनयिकों व मंत्रियों में होड़ लगी थी। एक के बाद एक इतने वीआईपी जुटने लगे कि आगे की कतारों में कुर्सियों की कमी पड़ गई, रंजन भट्टाचार्य के लिए शाहनवाज हुसैन ने अपनी कुर्सी छोड़ दी तो मनोज तिवारी, निशिकांत दुबे जैसे भाजपा नेता भी मुख्य द्वार के समीप खड़े नज़र आए। शबाना आज़मी भी उस दरम्यान बेहद भावुक नज़र आईं, अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद मुरली मनोहर जोशी भी आए, विदेश मंत्री एस जयशंकर, रवि शंकर प्रसाद, डॉ. हर्षवर्द्धन, हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर और भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा की भी उपस्थिति देखी गई। विजय गोयल और मनोज तिवारी लोगों की अगवानी करते नज़र आए तो प्रबंधन का सारा जिम्मा अकेले सुधांशु मित्तल ने संभाल रखा था। सबको मालूम है कि सुषमा जी कृष्ण की अनन्य उपासकों में शुमार थीं, ’जय राधा माधव जय कुंज बिहारी हरे कृष्ण, हरे कृष्ण हरे हरे’ सुषमा जी के घर की लैंड लाइन पर भी यही धुन बजती थी। कृष्ण की अनन्य उपासिका सुषमा को जहां नीला रंग प्रिय था वहीं उनकी कोशिश रहती थी कि घर हो या गाड़ी उसका नंबर 8 होना चाहिए। वे लंबे समय तक 8 सफदरजंग लेन के अपने सरकारी आवास में रहती आई थीं। किडनी प्रत्यारोपन से पहले भी सुषमा ने कहा था कि ’जैसा कृष्ण चाहेंगे वही होगा, उन पर ही सब छोड़ती हूं।’ जब मंचासीन गायक मंडली ने सुषमा जी के सबसे प्रिय भजन को गाना शुरू किया तो उनके पति स्वराज कौशल और पुत्री बांसुरी स्वराज अपने भावनाओं के अतिरेक को नहीं रोक पाए। बांसुरी एक बेहद संक्षिप्त उद्बोधन के लिए मंच पर आईं, और जब उन्होंने कहा कि उनकी मां संसद में शेरनी-सा दहाड़ती थीं, लेकिन जब हंसती थी तो लगता था यह किसी पांच वर्ष के बच्चे की बाल सुलभ हंसी है। बांसुरी ने अपने कमाल की हिंदी और शब्दों के चयन से साबित कर दिया कि वह अपनी मां की गौरवशाली विरासत की असली उत्ताधिकारी हैं।

 
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