शाह के विकल्प की तलाश

December 27 2018


इन दिनों संघ और इसके आनुशांगिक संगठनों में लगातार विचार-मंथन के दौर गर्म है कि भाजपा की हिंदी पट्टी में इतनी बुरी गत क्यों हुई। तो इस मंथन से कुछ विश और कुछ अमृत निकल कर सामने आए हैं। एक विचार यह भी उभर कर सामने आया है कि चूंकि भाजपा के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री दोनों ही गुजराती हैं, यह बात हिंदी पट्टी को ठीक से हजम नहीं हो रही। वैसे भी अमित शाह की कार्यशैली को लेकर पार्टी कार्यकर्त्ता कभी भी इतना खुश नहीं रहा है। सो, फिलवक्त पार्टी को एक ऐसे अध्यक्ष की दरकार है जो सभी के लिए उपलब्ध हो और हर किसी की बात सुन सके। इसके बाद संघ के ही एक पदाधिकारी की ओर से शिवराज सिंह चौहान का नाम सुझाया गया, इनकी राय में शिवराज लोकप्रिय भी हैं और सहज भी। शिवराज को संघ की ओर से ’फिलर’भी भेजा गया है, पर वे मध्य प्रदेश छोड़कर आने को तैयार नहीं हो रहे। इसके बाद नितिन गडकरी का नाम सामने आया, पार्टी कैडर में भी इनके नाम पर व्यापक स्वीकार्यता है, पर संघ को लगता है कि गडकरी के नाम पर मोदी नहीं मानेंगे। अब ले-देकर निगाहें राजनाथ सिंह की ओर पलटी है जिनसे न तो मोदी को कोई खतरा है और न ही संघ को कोई दिक्कत। क्या यही वजह है कि पार्टी के अंदर से शाह के खिलाफ आवाजें उभरने लगी है, क्या यह बिना संघ के आशीर्वाद के संभव है?

 
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