अकबर का सलीम बन जाना

October 23 2018


जब राफेल को लेकर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस कुछ ज्यादा ही शोर मचाने लगी तो कहते हैं इससे देश का ध्यान भटकाने के लिए, भगवा ख्वाहिशों ने ’मीटू’ को भारत में हवा दी। नाना पाटेकर अपने निजी पूर्वाग्रहों से अलहदा महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों के नए रहनुमा बनकर उभर रहे थे, और विदर्भ में भाजपा के लिए एक नया सिर दर्द बन रहे थे। फिर इसके तारणहार की खोज हुई और 8 वर्षों के अंतराल के बाद अमेरिका से खोज-खाजकर तनुश्री दत्ता को भारत लाया गया, हालांकि इतने वर्षों के बाद भी अभिनेत्री तनुश्री ने जो मुद्दे उठाए देश की संवदेना उनके साथ रही और नाना हीरो से प्रतिनायक की भूमिका में अवतरित हो गए। सुर्खियों से राफेल गायब हुआ और उसकी जगह ’मीटू’ ने ले ली। इधर एमजे अकबर को भी मोदी-शाह के प्रति अपनी वफादारी की अग्नि परीक्षा देने का शौक चर्राया और उन्होंने देश के एक सबसे बड़े अंग्रेजी दैनिक में एक लेख लिख डाला-’देयर इज नो अंकल क्वात्रोच्चि दिस टाइम’ (इस बार यहां किसी अंकल क्वात्रोच्चि (बोफोर्स फेम के) का काम नहीं)। यह लेख, इसकी भाषा और इसके विचार गांधी परिवार को तिलमिलाने वाले थे। सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने फौरन इस बात का संज्ञान लिया, सोनिया को इस बात से भी तकलीफ पहुंची थी कि अकबर को राजनीति में लाने वाले उनके स्वर्गीय पति राजीव गांधी ही थे, गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले पत्रकार राशिद किदवई को याद किया गया, वे उस वक्त भोपाल में थे, उन्हें फौरन भोपाल से दिल्ली तलब किया गया। आनन फानन में कांग्रेस की ओर से एक कोर टीम का गठन हुआ। पत्रकार प्रिया रमानी आगे आईं, जिनके पति को केंद्र सरकार के दवाब की वजह से एचटी के संपादक पद से दो वर्ष पूर्व हटना पड़ा था। प्रिया ने जैसे ही एक बार अकबर के खिलाफ ’मीटू’ की मशाल जलाई, एक के बाद एक कर अकबर के साथ पूर्व में काम कर चुकीं पत्रकार आगे आने लगीं और ऐसे में अकबर का सलीम बन जाना लाजिमी ही था।

 
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