Archive | April, 2019

गाजीपुर की गाज सिन्हा पर

Posted on 29 April 2019 by admin

संघ और मोदी दुलारे मनोज सिन्हा केंद्र सरकार के चंद ऐसे मंत्रियों में शुमार थे जिन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र का चेहरा-मोहरा चमकाने के लिए दिन-रात एक कर दिए। यह तो सिन्हा के राजनैतिक विरोधी भी मानते हैं कि उन्होंने गाजीपुर में विकास की जितनी योजनाएं चलाई, आधारभूत संरचनाओं में खर्च करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार का जितना पैसा लेकर आए उतना उनके किसी भी पूर्ववर्ती सांसद के वश का रोग नहीं था। फिर भी सियासत की विडंबना देखिए कि अफजाल अंसारी जैसे प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले इस दफे वे गाजीपुर से एक कमजोर विकेट पर खड़े नज़र आते हैं। क्योंकि दुर्दांत मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल यहां से महागठबंधन के उम्मीदवार हैं और जातीय गणित की बिसात पर गाजीपुर में उनकी संभावनाएं कहीं बेहतर दिख रही है। कभी गाजीपुर को भूमिहारों का गढ़ कहा जाता था, सनद रहे कि सिन्हा भी इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं। पर विडंबना देखिए कि नए परिसीमन के बाद भूमिहार वोटरों का बड़ा वर्ग बलिया संसदीय क्षेत्र में चला गया है। कहते हैं गाजीपुर से कोई ढाई लाख भूमिहार वोट परिसीमन के अंतर्गत बलिया में चले गए हैं। रेवतीपुर, सेवपुर, जमनिया, मोहम्मदाबाद जैसे भूमिहारों के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र अब बलिया का हिस्सा है। कहते हैं अब यहां भूमिहार वोट 75 हजार से भी कम रह गए हैं। अब यह एक यादव बहुल क्षेत्र में अवतरित हो गया है जहां सपा का असर है। ओम प्रकाश राजभर की भाजपा से नाराज़गी भी सिन्हा को भारी पड़ रही है, क्योंकि यहां डेढ़ लाख से ज्यादा राजभर वोट हैं जो भाजपा से छिटक रहे हैं। भाजपा छोड़ कर आए रमाकांत यादव यहां से कांग्रेस के टिकट पर लड़ना चाह रहे थे, पर कांग्रेस ने उन्हें भदोही भेज दिया, नहीं तो अगर यहां से रमाकांत यादव लड़ते तो यादव वोटों में दोफाड़ संभव थी। सो, अब सिन्हा यहां अब तक की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं।

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उदित का सूर्य ऐसा हुआ अस्त

Posted on 29 April 2019 by admin

भले ही दलित नेता उदित राज ने भगवा पार्टी से नाराज़ होकर अब कांग्रेस का दामन थाम लिया हो पर उनके सियासी सूर्य को भगवा ग्रहण लग ही गया है क्योंकि उन्हें ऐसे वक्त भाजपा ने झटका दिया है कि चुनावी संभावनाएं बहुत हद तक क्षीण हो गई है। स्वयं उदित राज का दावा है कि उन्होंने कम से कम 3 बार मोदी को फोन किया पर वे लाइन पर नहीं आए, हालांकि उनसे जरूर कहा गया कि वे रामलाल से मिल लें। कहते हैं जब उदित रामलाल से मिलने पहुंचे तो उनसे कहा गया कि टिकट वितरण के लिए केवल और केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष जी यानी अमित शाह अधिकृत हैं। सूत्रों की मानें तो इसके बाद उदित ने अमित शाह को फोन लगाना शुरू किया, उनके घर की परिक्रमा लगानी शुरू की पर न शाह मिले और न ही उनका फोन। तो हैरान-परेशान इस भाजपा सांसद ने नितिन गडकरी को फोन लगा दिया, अपनी बेबाकी के लिए मशहूर गडकरी ने उन्हें दो टूक बता दिया कि इस दफे उन्हें टिकट नहीं मिल रही। वहीं दूसरी ओर दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ऐन वक्त तक उदित को आश्वस्त करते रहे कि उनका टिकट पक्का है। अंत में थक-हार कर उदित राज अरूण जेटली की शरण में पहुंचे तो राजनीति के चतुर सुजान जेटली ने उन्हें बता दिया कि उनका टिकट राजनीतिक नहीं, नीतिगत रूप से काटा जा रहा है।

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क्या पार लगेगी कन्हैया की नैया?

Posted on 29 April 2019 by admin

बेगुसराय का चुनावी मैदान इस दफे बेहद दिलचस्प हो गया है। जेएनयू फेम के कन्हैया कुमार ने यहां के त्रिकोणीय मुकाबले को किंचित रोचक बना दिया है। पहले गिरिराज सिंह यहां कुछ बेदम से दिख रहे थे अब भाजपा ने यहां पूरा दम लगा दिया है। कन्हैया के पक्ष में बुद्धिजीवियों ने एक समां बांध रखा है आंदोलनकर्मी, शिक्षाविद् से लेकर बॉलीवुड के लोग कन्हैया के पक्ष में अलख जगा रहे हैं। कहते हैं केवल ’क्राउड फंडिंग’ से कन्हैया के लोगों ने 70 लाख से ज्यादा की रकम जुटा ली है। विदेशों में रहने वाले लोग भी खुले दिल से पैसा भेज रहे हैं। गिरिराज सिंह को भाजपा की स्थानीय इकाई से ही भीतरघात का भय सता रहा है। यहां के पूर्व भाजपा सांसद जो अब दिवंगत हो गए हैं, भोला सिंह की पुत्रवधु भले ही यहां की बछवाड़ा विधानसभा सीट से चुनाव हार गई हों पर स्थानीय भूमिहारों में तो उनका असर है ही। बेगुसराय सीट को भूमिहार जाति का गढ़ माना जाता है यहां साढ़े चार लाख से ज्यादा इस जाति के वोट हैं। भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह और वामपंथी उम्मीदवार कन्हैया दोनों इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं। लालूनीत गठबंधन ने यहां से तनवीर हसन को मैदान में उतारा है। भाजपा खेमा जोर-शोर से कन्हैया को देशद्रोही साबित करने की मुहिम में जुटा है तो कन्हैया समर्थकों ने जाति का एक नया कार्ड खेल दिया है, सूत्रों की मानें तो अब वे भूमिहार जाति में भी कन्हैया का गौतम गोत्र सामने लेकर आ गए हैं। युवाओं और बहुत हद तक मुस्लिम वोटरों का कन्हैया को पहले से समर्थन हासिल है अगर वे भूमिहार वोटरों में दोफाड़ करवाने में सक्षम रहते हैं तो वे गिरिराज और हसन के समक्ष एक महती चुनौती पेश करने में सफल हो सकते हैं। बिहार में जातिवादी राजनीति का कितना जलवा है इसे एक पुराने किस्से से समझा जा सकता है। यह बात 1991 की है जब लालू यादव की बिहार की राजनीति में तूती बोलती थी तो वे इंद्र कुमार गुजराल को पटना से चुनाव लड़वाने के लिए यहां लेकर आए थे। अब लालू के समर्थकों ने ही पूछना शुरू कर दिया है कि गुजराल की जाति क्या है तो चतुर सुजान लालू ने अपने समर्थकों से कहा कि आप गुजराल को पंजाब का गुर्जर यानी यादव समझ लो, बात फिर बन ही गई।

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दयोल का भगवा झोल

Posted on 29 April 2019 by admin

सन्नी दयोल को भाजपा ज्वॉइन कराने में अरूण जेटली की एक महती भूमिका बताई जाती है। सूत्रों की मानें तो काफी अरसे पहले हेमा मालिनी चतुर सुजान जेटली से मिली थी और उनसे सन्नी दयोल के लिए कुछ कानूनी सलाह मांगी थी। सूत्रों के दावों पर यकीन किया जाए तो हेमा ने जेटली को बताया था कि सन्नी के ससुराल पक्ष में प्रॉपर्टी को लेकर कुछ झगड़े चल रहे हैं। कहते हैं ऐसे में संकटमोचक जेटली ने सन्नी की मुश्किलें वाकई कम कर दी थी, इस बात ने सन्नी को जेटली का मुरीद कर दिया। सो, जब इस दफे जेटली ने सन्नी को भाजपा के टिकट पर गुरदासपुर लड़ने का ऑफर दिया तो वे किंचित मना नहीं कर पाए।

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भागवत कथा से परेशान शाह

Posted on 29 April 2019 by admin

संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयान न केवल भाजपा के गले की हड्डी बन जाते हैं बल्कि पार्टी को अलग-अलग चुनावों में उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त भागवत ने ऐसा ही एक बयान देकर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी कि ’आरक्षण को रिव्यू करने का वक्त आ गया है।’ चुनावी नतीजे गवाह हैं कि कैसे बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। चार राज्यों के विधानसभा चुनावों की बेला आई तो संघ प्रमुख ने राम जन्मभूमि का मुद्दा उठा दिया। इन चुनावों के नतीजे भी भगवा पार्टी के लिए पीड़ादायक थे अब जबकि देश में आम चुनाव संपन्न हो रहे हैं तो पिछले सप्ताह नागपुर की एक सभा में स्वयं सेवकों को संबोधित करते हुए भागवत ने कह दिया-’पहले देश में 30-40 साल सरकारें राज किया करती थीं, अब तो सरकार 5 साल चलती है, सो स्वयं सेवकों को सरकार से अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, उन्हें जो भी करना है अपने बलबूते करे।’ संघ प्रमुख के इस बयान ने यकनीन शाह की पेशानियों पर बल बढ़ा दिए हैं।

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…और अंत में

Posted on 29 April 2019 by admin

’मीटू’ अभियान से लपेटे में आए निर्देशक विवेक अग्निहोत्री अपने ट्विटर अकाऊंट पर हमेशा से भाजपा के लिए जोरदार पैरवी करते नज़र आते हैं, संघ में भी उनकी गहरी पैठ बताई जाती है। सो, अपनी ताजातरीन फिल्म ’ताशकंद फाइल्स’ की विशेष स्क्रीनिंग विवेक ने नागपुर के रेशीमबाग स्थित संघ मुख्यालय में रखवाई, वह भी खास तौर पर संघ प्रमुख भागवत के लिए। फिल्मों से बेहद कम लगाव रखने वाले भागवत न सिर्फ उस फिल्म को देखने को आए बल्कि फिल्म की तारीफ में कसीदे भी पढ़ दिए। सनद रहे कि यह फिल्म देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के रहस्यों से पर्दा उठाती है और इससे जुड़े कई विवादों पर भी रोशनी डालती है। (एनटीआई-gossipguru.in)

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बड़ी मुश्किल से आई मनीष तिवारी की बारी

Posted on 29 April 2019 by admin

सियासत का दस्तूर भी क्या निराला है, कांग्रेसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रखर कांग्रेसी वक्ता मनीष तिवारी को इस दफे के चुनाव में पार्टी का टिकट पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि तिवारी की पहली च्वॉइस चंडीगढ़ थी जहां पुराने कांग्रेसी पवन बंसल ने वहां के संगठन में अपनी गहरी पैठ बना रखी है। तिवारी पिछले कई वर्षों से अपने लिए चंडीगढ़ को सिंचित कर रहे थे। बंसल खेमे के जवाब में उन्होंने वहां अपने विश्वासपात्रों की एक छोटी-सी टीम भी खड़ी कर ली थी, पर सियासी शह-मात के खेल में माहिर बंसल के आगे उनकी एक न चली, कहते हैं बंसल ने बेहद चतुराई से उनके लोगों को कांग्रेस से बाहर का दरवाजा दिखा दिया। पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह से तिवारी की गहरी छनती है सो, कैप्टन ने मनीष के लिए एक नई सीट की तलाश की आनंदपुर साहिब, पर राहुल गांधी उन्हें संगरूर लोकसभा सीट से चुनाव लड़वाना चाहते थे, पर कैप्टन को यह मंजूर न था। फिर मनीष ने सैम पित्रोदा से बात की कि वे राहुल को समझाएं, इस मामले में राहुल के बेहद करीबी माने जाने वाले और उन्हें वायनाड ले जाने वाले वेणुगोपाल ने भी राहुल से बात की। मनीष और वेणुगोपाल दोनों ही छात्र राजनीति से आगे आए हैं और तब से इन दोनों की दोस्ती है। जब मामला अटका रहा तो मनीष सोनिया गांधी से मिलने गए और उनसे आग्रह किया। पर सोनिया ने राहुल गांधी से सीधी बात करने के बजाए इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अधिकृत कर दिया कि वे इस बारे में राहुल से बात करें। इस ताकीद के साथ कि ’वी नीड मनीष इन पार्लियामेंट’। इस बीच चुनाव समिति की बैठक आहूत हुई और राहुल के समक्ष वेणुगोपाल ने आनंदपुर साहिब का डॉसियर रखा। जिसे तैयार करवाने में प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सुनील जाखड़ की एक महती भूमिका थी जो खुद भी आनंदपुर साहिब से टिकट चाहते थे। इस डॉसियर में कथित तौर पर जाखड़ ने लिखवा दिया था कि इस सीट पर 65 फीसदी सिख मतदाता हैं, जबकि असल में यह हिंदू मतदाताओं का आंकड़ा था। बात राहुल के समझ में आ गई और उन्होंने देर से ही सही आनंदपुर साहिब से तिवारी के नाम को हरी झंडी दिखा दी।

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गफलत में हैं तमाम दल

Posted on 29 April 2019 by admin

देश में तीन फेज के चुनाव संपन्न हो चुके हैं पर सटीक कयासों की कोई तस्वीर उभर कर सामने नहीं आ पा रही, वोटरों ने भी जैसे अपनी जुबां और भंगिमाओं पर सन्नाटों के गहने पहन रखे हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दल तीन फेज संपन्न होने के बाद अपनी पसंदीदा एजेंसियों से एक्जिट पोल करवा रहे हैं। एक नहीं कई-कई एजेंसियों से, पर संशय का आलम बरकरार है, कोई साफ तस्वीर उभर कर सामने नहीं आ रही। आने वाले चरण के चुनाव हिंदी पट्टी के हैं जहां भाजपा को अपना दबदबा बरकरार रखने की लड़ाई लड़नी है, सो, आने वाले चरणों के लिए पार्टी अपना पूरा धन-बल झोंक रही है। संघ भी अपने कार्यकर्ताओं को डोर-टू-डोर कैंपेन के लिए प्रेरित कर रहा है, वाराणसी में नामांकन के वक्त मोदी का इतना बड़ा मेगा शो भी इसी संशय से बाहर निकलने की बेकरारी बताता है। यहां तक कि शेयर मार्केट के ट्रेंड भी उथल-पुथल मचा रहे हैं, कभी बाजार चढ़ता है तो भगवा चेहरों पर आशाएं बिखेर जाती है, फिर झम्म से बाजार गिर जाता है तो विपक्ष को मुस्कुराने की वजह मिल जाती है। अभी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं जहां भाजपा का काफी कुछ दांव पर लगा है सो, राकेश झुनझुनवाला जैसे बाजार के पंडितों से आशाभरे बयान दिलवाए जा रहे हैं। और ये मोदी के दुबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणियां कर रहे हैं। लेकिन जब चुनावी बाजार में खामोशियां आवाजें देकर बुला रही हों और जब चुप्पियां घर आ जा रही हों तो पक्के तौर पर कुछ कह पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है।

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कितनी हिंदू हैं प्रियंका

Posted on 08 April 2019 by admin

काशी के अति प्रतिष्ठित बाबा विश्वनाथ के मंदिर में प्रियंका गांधी वाड्रा के दर्शन को लेकर खासा बवाल मचा हुआ है और कई हिंदूवादी संगठन उनके हिंदू होने का हलफनामा देने की मांग कर रहे हैं। तो वहीं कांग्रेस की ओर से यह तर्क आ रहा है कि प्रियंका के हिंदू होने पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। इनका कहना है कि जब प्रियंका गांधी का विवाह राबर्ट वाड्रा से हुआ तब इन दोनों का विवाह दिल्ली के सीताराम बाजार के एक पुराने कश्मीरी पंडित ने करवाया, जिनका गांधी परिवार में कई वर्षों से आना-जाना था। यहां तक कि इस विवाह की तमाम रस्में कश्मीरी हिंदू रीति रिवाज से संपन्न हुई। विवाह से पहले प्रियंका को बकायदा ’डेजारू’ पहनाया गया। जब भाई राहुल को अपनी बहन को विदा करना था तब उन्होंने जनेऊ धारण नहीं कर रखा था। फिर पंडित ने राहुल को जनेऊ धारण करवाया जिसे वह कश्मीरी हिंदू रीति से अपनी बहन को विदा कर सके। विवाह कराने वाले पंडित को भी गांधी परिवार की ओर से तोहफे में एक कश्मीरी शॉल भेंट की गई थी। सो, गांधी परिवार से ताल्लुकात रखने वाले इन कांग्रेसियों का पक्के तौर पर मानना है कि प्रियंका और राहुल को अपने हिंदू होने के प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं।

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प्रसाद-सिन्हा की सिर फुटौव्वल

Posted on 08 April 2019 by admin

केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने जब से पटना की धरती पर कदम रखा है, पार्टी के दो गुटों में सिर फुटौव्वल कम होने का नाम ही नहीं ले रही। भाजपा हाईकमान के बीच-बचाव के प्रयासों के बावजूद आर.के.सिन्हा गुट का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। कहते हैं आर.के.सिन्हा गुट का पक्का भरोसा था कि अगर इस दफे पटना साहिब से शॉटगन यानी शत्रुघ्न सिन्हा का टिकट काटा जाता है तो उनकी जगह आर.के.सिन्हा के बेटे रितुराज सिन्हा को मैदान में उतारा जाना चाहिए था। पर सियासी शहमात के खेल के उस्ताद बाजीगर रवि शंकर प्रसाद ने मीडिया में यह खबर उड़वा दी कि आर. के. सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच रिश्तेदारी है। यह भी कहा जाता है कि सिन्हा के देहरादून स्थित स्कूल में बतौर चीफ गेस्ट के तौर पर शॉटगन की पत्नी पूनम सिन्हा या फिर उनकी पुत्री सोनाक्षी सिन्हा को आमंत्रित किया जाता रहा है और ये दोनों भी बड़े शौक से सिन्हा के प्रस्ताव को शिरोधोर्य करती रही हैं।

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